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मूळ कवितावां रो साखीणो अनुसिरजण : ऊंडै अंधारै कठैई

    ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ संग्रै मांय मनीसी कवि नंदकिशोर आचार्य री चवदै काव्य-पोथ्यां मांय सूं चारबीसी-तीन टाळवीं कवितावां रो अनुसिरजण, ऊरमावान कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया घणै मनोग्यान सूं करियो है। आपां मांय सूं घणा-सारा पाठक नंदकिशोर आचार्य री थोड़ी-भोत कवितावां जरूर पढ़ी है, पण बांरै सांवठै सिरजण री सांवठी बानगी सूं रू-ब-रू होवण वाळा भोत कम ई पाठक मिलैला। आं पाठकां मांय गीरबैजोग अेक नाम डॉ. नीरज दइया रो भी है, जका नंदकिशोरजी री सैंग काव्य-पोथ्यां री कवितावां नै नीं फगत पढी, पण पढणै रै सागै-सागै मूळ कवितावां रै मर्म नैं भावाभिनय रै समचै सहेज्यो, अंवेरियो अर आत्मसात ई करियो। ओ ईज कारण रैयो कै अनुसिरजक आपरी दीठ सूं आं कवितावां मांय अेक-सूं-अेक इधकी कवितावां इण संग्रै मांय पाठकां सारू संजोई है।
    संग्रै रै ‘आमुख’ मांय अनुसिरजण नैं मूळ कविता रो भावाभिनय बतावता थकां अनुसिरजक लिखै- ‘आचार्यजी री नाटक माथै लिखी कवितावां बांचता म्हनै लखायो जाणै अनुसिरजण ई अेक भांत रो भावाभिनय हुवै। जिण ढाळै नाटक मांय कलाकार आपरै अभिनय सूं मूळ पात्र अर मूळ रचाव नै जीवै, ठीक बियां ई अनुसिरजण मांय म्हैं मूळ कवि अर कविता नै जीवण री पूरी-पूरी कोसीस करतो रैवूं।’ हरख री बात है कै डॉ. दइया इण कोसीस मांय भरोसैजोग भावाभिनय करियो है। ‘आमुख’ मांय बै लिखै- ‘कवि री मौलिकता इण मांय हुवै कै बो घणी कवितावां बांचै। किणी कविता पेटै म्हनै लागै कै आ म्हारी भासा में आवणी चाइजै तो अेक तरीको तो ओ है कै उण जोड़ री कविता रचूं। कोई कवि किणी कवि जिसी कोई रचना रचै, तो मौलिकता कांई हुवै?’ अैड़ी सैंग जिग्यासावां रा समाधान इण कवितावां मांय ईज मिल जावै।
    ‘मूळ’ कविता री बानगी देखो- ‘रचूं थन्नै/ कित्ती भासावां मांय/ मूळ है हरेक भासा मांय/ कठैई थूं अनुसिरजण कोनी। बसंत री हुवै का पतझड़ री/ पंखेरूवां री का पानड़ा री/ भाखरां री का झरणां री/ काळ री का बिरखा री।
    मरुथळ रै बुगलां री हुवो/ समदर रै तूफानां री/ लुकोवण री, का भेद खुल जावण री/ मून री हुवो का बंतळ री/ रोवण री, मुळकण री/ मिलण री, का मिलण सूं ईज/ आंती आय जावण री।
    हरेक मौलिकता/ आपोआप मांय निरवाळी--/ म्हारी हरेक कविता/ भासा नै नवी करती थकी।’
    इण कविता नैं प्रस्थान-बिंदु मानता थकां जठै मौलिकता, मूळ कविता अर अनुसिरजण रो जथारथ पाठकां साम्हीं आवै बठै ईज संग्रै री हरेक कविता भासा नै नवी करती लखावै। किणी अेक भासा री भावभोम रो बीजी भासा में हू-ब-हू रचाव, अनुसिरजण रै सीगै, अेक लोक सूं बीजै लोक री जातरा दांई लखावै। डॉ. दइया रै सबदां में- ‘म्हारी दीठ मांय नंदकिशोर आचार्य री पूरी काव्य-जातरा री असल कामाई किणी अरथ मांय ऊंडै अंधारै कठैई पूग’र आपरै बांचणियां साम्हीं अबोट साच लावणो मानी जावैला। इण ओळी नै दूजै सबदां मांय इण ढाळै कैय सकां कै बै ऊंडै अंधारै कठैई फगत पूगै ई कोनी, आप भेळै बांचणियां नै उण अंधारै रै लखाव मांय लेय’र जावै। आ अेक लोक सूं दूजै लोक री जातरा कैयी जाय सकै। जूनै रंगां साम्हीं नवा रंग, नवा दीठाव। आज पळपळाट करती इण दुनिया मांय कोई पण दीठाव सावळ-सावळ आपां अंधारै री दिसाअ सूं ईज देख-परख सकां।’ आ बात खरी है, अंधारै बिना उजाळै रो कांई अरथ? तमसोमाज्योतिर्गमय रै मारग बगती अै कवितावां ‘बगत’ मांय आपरै होवणै नैं अरथावै। ‘बगत’ कविता री अै ओळियां देखो- ‘बगत सूंप्यो-/ खुद नै/ म्हनै/ कीं ताळ तांई/ कै कीं बगत खातर/ बगत हुयग्यो हूं म्हैं।/ टिपग्यो सगळो बगत/ इणी दुविधा मांय।/ नीं बगत बणायो/ म्हारो कीं/ नीं बणा सक्यो म्हैं ईज/ बगत रो कीं।’ (पृ.68)
    बगत बीततो जावै अर जीयाजूण री जातरा ई मजल कानी बधती जावै। इण जातरा में खथावळ री ठौड़ मारग रै चप्पै-चप्पै सूं हेत दरसांवता थकां कवि कैवै- ‘रैयग्या दीठावां मांय’ - इण छेहलै पड़ाव माथै/ आंख्यां साम्हीं आवै/ बै सगळा दीठाव/ निरांयत सूं मिलणो नीं हुयो/ बेगो पूगण री खथावळ मांय-/ मजल पूग्यां ई/ अधूरी ईज रैयी जातरा।/ मजल माथै पूगणो जातरा कोनी/ मारग सूं प्रेम पाळणो पड़ै। - भटकूं छूटियोड़ा दीठावां मांय/ कर रैयो हूं अबै जातरा। (पृ.79)
    इण संग्रै री कवितावां मांय जीयाजूण रा बहुआयामी दीठाव आपां साम्हीं आवै, जठै प्रकृति-प्रेम रा दीठाव है, आतमा-परमातमा अर फेर- जलम रै भरोसै रा दीठाव है। अेक ठौड़ कवि कैवै- ‘फेरूं जलमण खातर’- किणी नै ठाह कोनी/ म्हारै आतमघात बाबत/ म्हनै खुद नै कठै ठाह हो/ खुद म्हैं टूंपो दियो/ आतमा नैं खुद री/ अर ओ जिको दीसूं आपानै/ हूं लोथ उण री/ पण आज/ अै आंख्यां/ जिकी कीं आली हुयगी-/ स्यात उणी रो दरद है/ फेरूं जलमण खातर म्हारै मांय। (पृ.78)
    अठै परायै दुख दूबळो नीं हुवण री मनगत मांय परदुख-कातरता रा दीठाव भी है। ‘पण आपां नै कांई’ कविता में कवि कैवै- ‘देखो/ मोरियै नै देखो/ जिकी पांख्यां सूं आपां नै/ बो दीसै रूपाळो/ पण कोनी भरीजै उडार/ बां रै पाण-/ लांबी अर ऊंधी।/ पण आपां नै कांई/ बस आपां तो राजी हां/ देख’र उण रो नाच। (पृ.91)   
    आं ओळ्यां मांय हर किणी रै दुख-दरद नै देखण-परखण री दीठ रो दीठाव हुवै, बठै ई सबद रै सीगै जीवण मांय औचित्य री अंवेर रा दीठाव भी है। ‘आसरै फगत ठौड़ माथै’ कविता री अै ओळियां इणी बात री साख भरै- ‘अेक सबद री ठौड़/ बदळियां/ बदळ जावै जाणै/ कविता री आखी दुनिया/ ठीक बियां ईज बदळ जावै/ सबद रो ई आखो-संसार।/ कांई किणी खुद रो/ कोनी कोई अरथ/ स्सौ-कीं है आसरै/ फगत ठौड़ माथै।’ (पृ.95)
    जाणै ऊंडै अंधारै कठैई अै दीठाव दीठाव जीयाजूण रा महताऊ पड़ावां माथै पळका नाखता थकां आपां नै मांयली-बारली दुनिया री नवी ओळखाण करावै। जठै जीयाजूण रा फीका पड़ियोड़ा रंग फेरूं खिल जावै। ‘जीयग्या’ कविता मांय अैड़ो अेक दीठाव देखो- ‘रंग/ जिका हुयग्या हा/ ठाडी ओस मांय/ गूंगा-/ अेक चिड़कली रै सुर में/ सगळा पाछा खिलग्या।’ (पृ.94)
    अंधेरे मांय सगळा रंग अेकमेक हुय जावै। किणी री अळगी ओळखाण री कल्पना तकात नीं करी जाय सकै। अैड़ै में ‘अंधारै ई ठीक’ कविता मांय नीं होवणै रो होवणो सबळाई सूं प्रगट हुवै- ‘भलांई कोनी/ म्हैं कठैई/ थारै दीठाव मांय/ अंधारै ई ठीक हूं।/ दीठाव सूं थाक’र/ जद-जद मींचीजैला आंख्यां/ लाधूंला म्हैं बठैई।’ (पृ.88)
    जीयाजूण मांय मोकळी अंवळायां-अबखायां है, पण जको सुख ‘सम’ माथै आयां मिलै, बो भाग-दौड़ मांय कठै है? ‘दिनूगै-सिंझ्या’ कविता मांय कवि कैवै- ‘आखै दिन/ खीरा उछाळतो जिको सूरज/ दिनूगै-सिंझ्या/ जद-जद धरती रै/ साथै हुवै/ हुय जावै कित्तो कंवळो/ कित्तो ऊजळो।’ (पृ.89) इण कविता नैं बांचती वेळा म्हनै लाग्यो, जाणै ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ री ठौड़ इण संग्रै रो नाम ‘मुंअंधारै कठैई’ भी राख्यो जाय सकै हो। दिनूगै सूं पैलां अर दिन आथमती वेळा ‘मुंअंधारै’ री संग्या सूं जाणी जावै। पण ऊंडै अरथ मांय ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ शीर्षक सारथक लखावै। इण कविता मांय कवि कैवै- ‘जिका दिखावणो चावै खुद नै/ बै जावै/ अंधारै सूं उजास कानी/ म्हैं जिको/ मन-आंगणै थारै/ लेवणी चावूं कठैई नींद/ ऊंडै अंधारै/ क्यूं भटकूं उजास खातर/ जिको कर देवै म्हनै थारै सूं अळगो।’ (पृ.63)
    ‘अभिनय कांई आतमघात हुवै’ अर ‘होकड़ो’ कवितावां मांय भी जीयाजूण रै मंच माथै आपरै होवणै अर आतम-ओळखाण रा दीठाव है। इण होवणै मांय कवि होवणो तो और ई अरथाऊ बात है। ‘कवि ईश्वर हुवै’ कविता मांय कवि कैवै- ‘जद कुमळावै फूल/ -खिलै जिको कुमळावै ईज-/ बसा लेवै उणां नै/ सबदां मांय आपां रै गुण मानता थकां/ खिल जावैला कुमळायोड़ा बै\ आ कविता ईज है/ कुमळायोड़ा नै ई खिला देवै-/ कवि इणी खातर ईश्वर मानीजै।’ (पृ.71)
    बारै री दांई अेक स्रिस्टि कवि रै मांयनै पण हुवै। जिकी बारै री स्रिस्टि सूं संवाद करणो चावै। “खोलै कोनी किंवाड़’ कविता मांय कवि कैवै- ‘अेक दुनिया बारै/ अर अेक मांय म्हारै।/ बा जिकी बारै है/ मिलणो चावै/ आय’र मांयली सूं/ इणी खातर खड़कांवती रैवै/ जद-कद उण रो कूंटो। (पृ.97)  इंसान मांय भगवान भी हुवै अर सैतान भी। दोनूं अेक-बीजै बाबत सोधै। अैड़ै में मानखै री मनगत रो भूंडो हाल हुंवतो लखावै। ‘कुटीजूं म्हैं’ कविता री अै ओळियां निजर है- ‘सैतान सोधै ईश्वर बाबत, सदीव/ अर सैतान बाबत ईश्वर।/ कूटीजूं म्हैं/ दोनूं बिचाळै/ दोनूं बसै मांय म्हारै/ सोचै--/ अेक-दूजै बाबत।’ (पृ.96) 
    इणी भांत जीयाजूण रै अंधारै-ऊजळै पखां नैं पड़तख करती आं कवितावां मांय ‘बरबरीक’ अर ‘पांचाली’ रा पौराणिक दाखलां रा दीठाव ई देखणजोग है। ‘बरबरीक’ में महाभारत रै जुद्ध में चतुर्भुजधारी री बाजीगरी बतावता थकां बरबरीक रै मूंढै सूं कवि कैवावै- ‘साम्हीं दीठाव भिड़ती हुवै/ छियावां कठपूतळियां री जियां।/ साच है, हां/ कठपूतळियां ई हा सगळा बै--/ जिकी नै डोर सूं झल्यां आभै मांय/ बो दीसै हो म्हनै/ चतुर्भुजधारी अेक बाजीगर/ खुद रै खेल सूं राजी/ - बो भयानक जुद्ध उण रो खेल ईज तो हो।’
    बीजै कानी ‘पांचाळी’ मांय द्रौपदी री मनगत केई ऊंडा अरथ उघाड़ती लखावै। भीष्म जद कैयो कै- ‘दुष्टां रो अन्न मति बिगाड़ दी ही।’ तद द्रौपदी रा अै बोल- ‘ना, पितामह/ अन्न तो बो सागी ई खावतो हो विकर्ण ई।’ सामाजिक नै नवी दीठ देवै। अै कवितावां धरम, अरथ, काम अर मोक्ष जैड़ा समाजू सरोकारां सूं जुड़िया सवाल उठावै अर राग-विराग सूं जुड़ी लोकमानसिक वृत्तियां रो ऊंडो जथारथ उघाड़ती थकी ‘दिन रो ई दिन’ दिखावण री आफळ करती ई लखावै। कवि कैवै- ‘कित्ता’क दिन रैवैला/ रात?/ कदैई तो आसी/ दिन रो ई दिन/ कोई तो।’ (पृ.51)
    म्हैं इण सांतरै अनुसिरजण सारू अनुसिरजक अर प्रकाशक नै हियैतणी बधाई देवूं। मूळ सिरजक री आसीस बिना तो ओ अनुसिरजण संभव ई नीं हो, बांनैं घणा-घणा रंग। प्रणाम"
० डॉ. मदन सैनी
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पोथी : ऊंडै अंधारै कठैई / विधा : अनुवाद (काव्य)
मूळ : नंदकिशोर आचार्य (हिंदी) / अनुवाद : नीरज दइया
संस्करण : 2016, पैलौ / पृष्ठ : 120, मोल : 200 रुपया
प्रकासक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334005

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शिविरा, अगस्त 2016 में प्रकाशित --->>

मूल कविताओं का सार्थक अनुसृजन : ऊंडै अंधारै कठैई

    ‘ऊंडै अंधारै कठैईसंग्रह में मनीषी-कवि डॉ. नंदकिशोर आचार्य के 14 काव्य-संग्रहों से चयनित 83 कविताओं का अनुसृजन, ऊर्जावान कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने गहन मनोयोग से किया है। इस अनुवाद के बहाने डॉ. दइया ने आचार्य के संपूर्ण कवि-कर्म का अध्ययन-मनन और चिंतन कर मूल कविताओं के मर्म और आत्मा तक पहुंचे है। अनुवाद को भावाभिनय की संज्ञा देकर सच में अनुवादक ने मूल भावों और व्यंजनाओं को सहेजते-संभालते आत्मसात कर यह अनुवाद किया है। यही कारण है कि एक से बढ़कर एक कविताओं को अनुवादक ने अपनी कवि-दृष्टि और विवेक से चयनित कर एक सार्थक अनुसृजन पाठकों को उपलब्ध करवाया है। अनुवादक के शब्दों में- ‘‘जिस प्रकार नाटक में कलाकार अपने अभिनय से मूल पात्र और समग्र रचाव को जीता है, ठीक उसी भांति मैं भी अनुसृजन करते हुए मूल कविता को भीतर गहरे तक जीने का पूरा-पूरा प्रयास करता हूं।” हर्ष का विषय है कि संग्रह में डॉ. दइया ने जीवंत अनुवाद कर कविताओं को अपनी मातृभाषा राजस्थानी में पुर्नजीवित किया है।  
            राजस्थानी में काव्यानुवाद का एक अंश देखिए- “रचूं थन्नै/ कित्ती भासावां मांय/ मूळ है हरेक भासा मांय/ कठैई थूं अनुसिरजण कोनी। बसंत री हुवै का पतझड़ री/ पंखेरूवां री का पानड़ा री/ भाखरां री का झरणां री/ काळ री का बिरखा री।”
            एक भाषा की भावभूमि को अन्य भाषा में हू-ब-हू अनुसृजन के माध्यम से सृजित करना असल में एक लोक से अन्य लोक की यात्रा है। डॉ. दइया के शब्दों में- “मेरी दृष्टि में नंदकिशोर आचार्य की समग्र काव्य-साधान की असल कमाई किसी अर्थ में गहन अंधकार में कहीं पहुंच कर अपने पाठकों के समक्ष सर्वथा नवीन सत्य का उद्घाटन ही है। इसे दूसरे शब्दों में इस भांति कहा जा सकता है कि वे निवड़ अंधकार में सिर्फ पहुंचते ही नहीं, वरन अपने साथ पाठकों को भी उस अंधकार के अहसास में ले कर जाते हैं।”
            यह बात सत्य है, बिना अंधेरे के, उजाले का क्या अर्थ? तमसोमाज्योतिर्गमय के मार्ग चलती ये कविताएं अपने समय में अपने होने को व्याख्यायित करती हैं। बगतकविता की ये पंक्तियां देखिए- बगत सूंप्यो-/ खुद नै/ म्हनै/ कीं ताळ तांई/ कै कीं बगत खातर/ बगत हुयग्यो हूं म्हैं।/ टिपग्यो सगळो बगत/ इणी दुविधा मांय।/ नीं बगत बणायो/ म्हारो कीं/ नीं बणा सक्यो म्हैं ईज/ बगत रो कीं।’ (पृ.68)
            इस संग्रह की कविताओं में जिंदगी के बहुआयामी-विविधवर्णी दृश्य-चित्र हमारे समक्ष आते हैं, इन में प्रकृति-प्रेम के दृश्य हैं, आत्मा-परमात्मा और फिर-फिर जन्म-मरण के विश्वास हैं। यहां दूसरों के दुख में दुर्बल होने की मनःस्थितियों में परदुख-कातरता के भी अनेक चित्र हैं। ऐसे में इस पुस्तक का पाठ अपने आप में एक द्वितीय अनुभव-यात्रा है।
            जिंदगी के अंधेरे-उजालों को प्रत्यक्ष साकार करती संग्रह की कविताओं में ‘वरबरीक’ और ‘पांचाली’ के विशेष पौराणिक संदर्भ उल्लेखनीय हैं। ‘बरबरीक’ महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण की उपस्थिति को बाजीगरी बताते हुए, बर्बरीक के मुख से कवि ने कहलवाया है- “साम्हीं दीठाव भिड़ती हुवै/ छियावां कठपूतळियां री जियां।/ साच है, हां/ कठपूतळियां ई हा सगळा बै--/ जिकी नै डोर सूं झल्यां आभै मांय/ बो दीसै हो म्हनै/ चतुर्भुजधारी अेक बाजीगर/ खुद रै खेल सूं राजी/ - बो भयानक जुद्ध उण रो खेल ईज तो हो।”
            एक अन्य और संग्रह की अंतिम कविता पांचाळीमें द्रौपदी की मनःस्थिति के कई गहरे-गहन अर्थ दर्शाती लंबी-कविता है। इस में जब भीष्म कहते हैं- दुष्टां रो अन्न मति बिगाड़ दी ही।तब द्रौपदी के ये शब्द- ना, पितामह/ अन्न तो बो सागी ई खावतो हो विकर्ण ई।सामाजिक को नवीन दृष्टि और अर्थ देने वाले हैं। ये कविताएं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे सामाजिक-सरोकारो से जुड़े अनेकानेक प्रश्नों को न केवल उठातीं हैं, वरन उनके भीतरी राग-विराग से जुड़ी लोकमानसिक वृतियों का भी गहन यर्थाथ प्रस्तुत करती हुई दिन रो ई दिनदिखाने के प्रयास करती दिखाई देती हैं। कवि के शब्दों में- कित्ताक दिन रैवैला/ रात?/ कदैई तो आसी/ दिन रो ई दिन/ कोई तो।’ (पृ.51)
            मैं इस शानदार अनुवाद के लिए अनुवादक डॉ. नीरज दइया और प्रकाशक को हृदय से बधाई देता हूं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मूल कवि डॉ. नंदकिशोर आचार्य के बिना आशीर्वाद के यह अनुवाद संभव नहीं था, उनको भी बहुत-बहुत साधुवाद और बधाई।

डॉ. मदन सैनी
विभागाध्यक्ष- हिंदी विभाग
मांगीलाल बागड़ी राजकीय महाविद्यालय,
नोखा (बीकानेर)
 

ऊंडै अंधारै कठैई : ठावकौ अर अजरौ काम / आईदानसिंह भाटी

‘ऊंडै अंधारै कठैई’ नीरज दइया रौ करियोड़ौ अनुसिरजण है, जिकौ पढतां बगत मूळ कवितावां रौ स्वाद चखावै। हिंदी रा चावा-ठावा कवि नंदकिशोर आचार्य री कवितावां, जिकै वां रै चवदै काव्य संकलनां में पसरियोड़ी ही, दइया आपरी दीठ सूं उण मांय सूं टाळ’र वां री टाळवीं कवितावां राजस्थानी में पाठकां तांई पुगाई है। वै इण किताब में कैयौ है के- “अनुसिरजण मूळ कविता रौ भावाभिनय व्हिया करै।” आपरी बात नै आगै बधावता वै कैवै- “औ अनुसिरजण करतां दोय बातां म्हैं खास ध्यान राखी। एक तौ आ के चावी-ठावी अर न्यारै-न्यारै पोत री कवितावां बानगी रूप ली जावै, दूजी बात के बै कवितावां ली जावै जिकी आपाणी भासा र इण धरा री मनगत सूं जुड्योड़ी है।” नीरज दइया इण अनुसिरजण में इण दोनूं बातां नै पोखी है अर आचार्य जी री कवितावां रै मरम तक पूग’र वां री सौरम पाठकां तक पुगावाण में सफळ व्हिया है। अज्ञेय रै चौथा सप्तक रा कवि नंदकिशोर आचार्य राजस्थान री हिंदी कविता रौ आगीवाण नाम है अर राजस्थानी आंचलिकता री सौरम हिंदी रै माध्यम सूं वां देस-परदेस में बिखेरी है। इण सौरम नै राजस्थानी पाठकां तक पुगावण रौ ठावकौ अर अजरौ काम भाई नीरज दइया कीनौ है जिण री किरणां ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ में रूपास रै साथै पळकै है। अनुसिरजण में अबखौ काम व्है मूळ आतमा रौ संवेदन पकड़णौ अर दूजी भासा में लावणौ, साखकर कविता में तौ घणौ अबखौ। पण नीरज दइया इण काम नै पूरी कूंत साथै पूरौ कीनौ है। राजस्थानी रै टकसाळी सबदां अर राजस्थानी रै मुहावरै नै परोट’र वां इण काम नै सांस्कृतिक रूप सूं पूरौ कीनौ है। आंचळिकता रै सागै पौराणिक चरित्रां री कवितावां रा भाव अर विचारबिंब साधण रौ अजरौ अनुसिरजण राजस्थानी पाठकां नै एक हिंदी कविता रौ स्वाद चाखण री निछरावळ भर है। म्हनै आ निछरावळ इण गत दीखी है- “नीं हुवै कवि रौ कोई घर/ बस जोवतौ इज रैवै घर/ बिंया बौ दीसतौ रैवै भासा मांय/ पण जिंया आभै मांय/ रैवै पंखेरू/” अर पंखेरू ज्यूं उठतै कवि रै एक घर नै, धरती माथै उतार’र दूजी भासा रै खोलियै बसावण रौ ठावकौ जतन नीरज दइया कीनौ है। इण जतन नै भाई मोहन आलोक इण गत सरायौ है- “ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री श्रेष्ठता ई कही जावैला के औ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै, बठै ई केई कवितावां रौ शब्दशः अनुवाद ई पाठकां साम्हीं राखै।” आचार्यजी री कलम अर नीरज नै बधाई।
आईदानसिंह भाटी, 8 बी-47, तिरुपति नगर, नांदड़ी, जोधपुर

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पोथी : ऊंडै अंधारै कठैई / विधा : अनुवाद (काव्य)
मूळ : नंदकिशोर आचार्य (हिंदी) / अनुवाद : नीरज दइया
संस्करण : 2016, पैलौ / पृष्ठ : 120, मोल : 200 रुपया
प्रकासक : सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334005

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(‘माणक’ मासिक जोधपुर / मई 2016)
 

अनुसिरजण – मूळ कविता रो भावाभिनय

नीरज दइया
            घणा रचनाकार इण पख नै पोखै कै सिरजण रो अर खासकर कविता रो उल्थो नीं हुय सकै। उल्थै खातर अनुसिरजण का रूपांतरण सबद परोटीजण री मनगत समझां।सिरै बात तो आ कै अनुसिरजण मांय असल सबद ‘सिरजण’ हुवै अर मूळ-आधार सिरजण ईज हुवै। मूळ सिरजण रै लारै-लारै पूगण री बात अर मूळ नै इधको मान देवण री बात अनुसिरजण पेटै सगळा स्वीकारै। ‘अनु’ रो अरथ दुबारा, पछै, लारै आद करीजै। मूळ भासा रै जोड़ मांय दूजी किणी भासा मांय दूसर सिरजण, सिरजण पछै रो सिरजण का कैवां कै सिरजण रै लारै-लारै उणी मनगत रो दूसरो सिरजण अनुसिरजण हुवै।
            म्हैं खुद सूं सवाल करूं- म्हैं म्हारी कविता छोड’र किणी दूजै री कविता नैड़ै क्यूं जावूं? म्हारो मानणो है कै अठै म्हारै ‘म्हैं’ री जागा म्हारो ‘काम’ महताऊ हुवणो चाईजै। ‘म्हारी कविता’ री जागा म्हनै ‘कविता’ महताऊ लखावै। कवि री मौलिकता इण मांय हुवै कै बो घणी सूं घणी कवितावां बांचै। किणी कविता पेटै म्हनै लागै कै आ म्हारी भासा में आवणी चाईजै तो अेक तरीको तो ओ है कै उण जोड़ री कविता रचूं। कोई कवि किणी कवि जिसी कोई रचना रचै, तो मौलिकता कांई हुवै? अर कोई कवि खोड़ क्यूं खुड़ावै? कवि अर मसीन मांय आंतरो हुवै। स्यात ओ ई कारण हुवैला कै कविता री सिरजणा तो जद-कद हुवै जद हुवै। दूजो तरीको है कै जिकी कविता नै दाय करूं उण नै म्हैं म्हारी भासा तांई लेय आवूं। आ मनगत अनुसिरजण री हुया करै। कविता नीं हुवण री वेळा अेक सुख किणी दूजी कविता मांय ऊंडो उतरणो हुय सकै। इण मांय अणमाप आणंद मिलै कै जिण कविता सूं हेत हुवै बा आपरी प्रीत म्हारी भासा मांय प्रगटै। अठै कैवणो लाजमी लखावै कै इणी प्रेम रै परताप ई उण मूळ कविता सूं केई बार अनुसिरजण इधको हुय जावै। नन्दकिशोर आचार्य री कवितावां पेटै तो आ बात केई कवितावां मांय देख’र आप ई साख भरोला। इण नै आप म्हारी भासा सूं म्हारो मोह ई कैय सको, पण म्हनै लागी जिकी बात कैयी।
            समकालीन भारतीय-साहित्य रा लूंठा अर वाजींदा नांवां भेळै मरुथळ री कीरत बखाणता नन्दकिशोर आचार्य जाणीजै। आखै हिंदी-जगत मांय राजस्थान सूं आपरो जस सिरै। मातभोम राजस्थान नै कविता मांय आदर देवणियै कवि री साहित्य-साधना उण मुकाम माथै पूगगी कै अबै किणी ओळख री दरकार कोनी, फगत आपरै नांव सूं जाणीजै। म्हारो ओ सौभाग कै म्हैं बाळपणै सूं कवि री रचनावां बांचतो आयो हूं। म्हनै आज ई चेतै आवै जद ब्लैक अेंड व्हाइट टेलीविजन रो जमानो हो अर दूरदर्शन रै कवि-सम्मेलन मांय आचार्यजी नै निरवाळै अंदाज मांय सुणण रो मौको मिल्यो। म्हैं कियां भूल सकूं कै मंचीय कवियां साम्हीं आ नवी कविता री जीत ही, बै ताळियां अर जूनो हरख आज ई म्हारै अंतस हेला करै। उण दिन रै कविता-पाठ रो असर कै कवि री बीजी रचनावां बांचण री हूंस जागी। म्हनै केई पोथ्यां तो म्हारै घरै ईज मिलगी। इण रो खास कारण कै म्हारा जीसा खुद कवि-कहाणीकार रूप चावा-ठावा हा। बां री निजू लाइब्रेरी सूं म्हैं घणै चाव बै पोथ्यां बांची।
            अठै म्हैं याद करणो चावूं मानजोग सूर्यप्रकाश बिस्सा नै कै बां री अपणायत रै पाण म्हनै केई-केई पोथ्यां बांचण रो सुख मिल्यो। बां दिनां सूर्य प्रकाशन मंदिर मांय हुई गोष्ठियां अर रचनाकारां सूं हुवण वाळी मेळ-मुलाकातां आजै ई अंजस री बात। नन्दकिशोर आचार्य री रचनावां सूं अेक कवि अर आलोचक रै रूप मांय नीं, म्हैं अेक पाठक रै रूप मांय प्रभावित रैयो। म्हारो संबंध अेक पाठक रै रूप में रैयो अर लगोलग आचार्यजी री साहित्य-साधना सूं म्हैं जुड़्यो रैयो।
            मोटो अचरज ओ कै आचार्यजी राजस्थानी में क्यूं नीं लिखै! जद कै राजस्थान रा केई हिंदी कवि-लेखक राजस्थानी में ई लिखै। इण बाबत म्हैं सवाल कर्यो। राजस्थानी रा पैला उपन्यासकार श्रीलाल नथमल जोशी बरसां पैली जद राजस्थानी भासा रै प्रचार-प्रसार में ‘मरुवाणी’ रा संपादक श्री रावत सारस्वत साथै जुड़्योड़ा हा तद री बात चेतै करतां नन्दकिशोरजी बतायो कै जोशीजी बां दिनां राजस्थानी में लिखण खातर घणो जोर दियो हो, पण बै आ बात अंगेज नीं सक्या। इणी भांत तेजसिंह जोधा ई घणी मनवार करी, तद विदेसी कविता रो राजस्थानी रूपांतरण नन्दकिशोरजी कर्यो जिको छप्यो ई। हिंदी कवि रूप जियां-जियां ओळख मिलती गई, नित बां साम्हीं राजस्थानी में रचाव रो अपणायत भर्यो नूंतो ई बधतो गयो, पण आचार्यजी राजस्थानी में लिखणो अंगेज नीं सक्या।
नन्दकिशोर आचार्य सदा सूं राजस्थानी रा हिमायती तो रैया अर निजू बात-बंतळ मांय घणी वेळा राजस्थानी परोटै। इण नै लेखक री ईमानदारी कैवतां बै बतावै कै लिखण में जिको संतोख अर सुख आतमा नै मिलै बो बां री दीठ मांय घणो जरूरी है। बां कैयो- म्हैं जिण भासा में सोचूं-विचारूं अर जिण मांय लिखतो रैयो हूं उण मांय ई खुद नै ठीक समझूं। आचार्यजी रो मानणो है कै अेक रचनाकार रूप जिण असल ऊरमा री दरकार किणी रचाव खातर हुवै, उण मांय विचार घणा महताऊ हुवै। जिकी भासा खुद रै चिंतन-मनन री हुवै उण नै टाळ बीजी भासा मांय अपरोगो लेखन दाय नीं आवै। इण बात नै इयां कैयी जाय सकै कै बां रो हिंदी लेखन अंग्रेजी लेखन करतां व्हालो है। हिंदी पेटै साहित्यकार नन्दकिशोरजी रो कमिटमेंट हो कै जिकी बातां खातर चरचा रैवती कै ओ काम फगत अंग्रेजी में हुय सकै हिंदी मांय नीं, बो काम आप हिंदी में कर दिखायो। जियां— ‘अहिंसा कोश’।
            म्हारो मानणो है कै किणी रचना मांय बुणगट अर विचार महताऊ हुवै, अनुसिरजण रै मारफत कोई रचना किणी ई भासा तांई पूग सकै। बीजी भारतीय भासावां रै रचनाकारां री केई पोथ्यां राजस्थानी मांय लावण रो सौभाग म्हनै आगूंच मिल्यो। जिकां री बरसां सूं आ चावना रैयी कै नन्दकिशोर आचार्य राजस्थानी में कविता लिखै, बां सगळा खातर ओ अनुसिरजण- ‘ऊंडै अंधारै कठैई’। आचार्यजी री नाटक माथै लिखी कवितावां बांचता म्हनै लखायो जाणै अनुसिरजण ई अेक भांत रो भावाभिनय हुवै। जिण ढाळै नाटक मांय कलाकार आपरै अभिनय सूं मूळ पात्र अर मूळ रचाव नै जीवै, ठीक बियां ई अनुसिरजण मांय म्हैं मूळ कवि अर कविता नै जीवण री पूरी-पूरी कोसीस करतो रैवूं। म्हनै इत्तै बरसां पछै जद लखायो कै हां अबै म्हैं म्हारै अंतस मांय कवि नन्दकिशोर आचार्य री साधना नै रचा-बसा ली है अर म्हैं खुद मांय कवि नै उतार सकूं, का इण ओळी नै इयां कैवूं—कविता रै अंतस खुद उतर सकूं... तद ई कलम सांभी।
            अठै म्हनै लोककथावां री दुनिया चेतै आवै। लोककथावां मांय परकाया प्रवेस री कथावां घणी चावी। कदैई-कदैई म्हनै लखावै कै मूळ रचना रै मारफत केई-केई रचनाकार अंतस मांय ऊंडा-ऊंडा उतर जावै अर म्हांनै अनुसिरजण खातर विवस करै। आ बात साव कूड़ी कोनी कै अनुसिरजण करती बेळा म्हारै मांय जाणै मूळ रचनाकार री कोई आतमा घुस जावै, अर जिको कीं म्हैं अनुसिरजण पेटै रचूं, बो असल मांय म्हैं नीं बा आतमा मतलब कै मूळ रचना रो रचनाकार ई रचै। अनुसिरजण मांय उण आतमा नै अंतस मांय रमावणी पड़ै। अंतस मांय इसी आतमावां नै रमावणो अर सिरजण री साख मांय अनुसिरजण करणो भावाभिनय नीं तो दूजो कांई है, इणी खातर अनुसिरजण नै म्हैं मूळ कविता रो भावाभिनय कैयो।
            ओ अनुसिरजण करतां दोय बातां म्हैं खास ध्यान राखी। अेक तो आ कै चावी-ठावी अर न्यारै-न्यारै पोत री कवितावां बानगी रूप ली जावै, दूजी बात कै बै कवितावां ली जावै जिकी आपणी भासा अर इण धरा री मनगत सूं जुड़्योड़ी है। अठै अेक बात भळै कैवणी लाजमी लखावै कै म्हैं मानूं कै हरेक कविता रो अनुसिरजण हुय सकै पण केई बार इण अनुसिरजण मांय मूळ कविता घणी लारै छूट जावै, सो इण ढाळै रै अनुसिरजण रो हिमायती म्हैं कोनी।
            ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ री कवितावां रो संचै-अनुसिरजण नन्दकिशोर आचार्य रै अबार तांई छप्या चवदै कविता-संग्रै— ‘जल है जहाँ’ (1980), ‘वह एक समुद्र था’ (1982), ‘शब्द भूले हुए’ (1987), ‘आती है जैसे मृत्यु’ (1990), ‘कविता में नहीं है जो’ (1995), ‘अन्य होते हुए’ (2007), ‘चाँद आकाश गाता है’ (2008), ‘उडऩा सम्भव करता आकाश’ (2009), ‘गाना चाहता पतझड़’ (2010), ‘केवल एक पत्ती ने’ (2011), ‘इतनी शक्लों में अदृश्य’ (2012), ‘छीलते हुए अपने को’ (2013), ‘मुरझाने को खिलाते हुए’ (2014) अर ‘आकाश भटका हुआ’ (2015) सूं करीज्यो है। इण संचै मांय कीं जूनी कवितावां कमती अर लारलै बरसां लिखीजी कवितावां बेसी लेवण लारै दीठ आ रैयी कै आप री पूरी काव्य-जातरा रो परिचै तो मिलै ई मिलै, साथै ई बगत-बगत माथै बदळती आचार्यजी री कविता रै मारफत हिंदी कविता रो ई पूरो अेक दीठाव मिलै। कवितावां रा लगैटगै सगळा रूप-रंग आप साम्हीं राखण री आ बानगी जाणो।
            म्हारी दीठ मांय नन्दकिशोर आचार्य री पूरी काव्य-जातरा री असल-कमाई किणी अरथ मांय ऊंडै अंधारै कठैई पूग’र आपरै बांचणियां साम्हीं अबोट साच लावणो मानी जावैला। इण ओळी नै दूजै सबदां मांय इण ढाळै कैय सकां कै बै ऊंडै अंधारै कठैई फगत पूगै ई कोनी, आप भेळै बांचणियां नै उण अंधारै रै लखाव मांय लेय’र जावै। आ अेक लोक सूं दूजै लोक री जातरा कैयी जाय सकै। जूनै रंगां साम्हीं नवा रंग, नवा दीठाव। आज पळपळाट करती इण दुनिया मांय कोई पण दीठाव सावळ-सावळ आपां अंधारै री दिसा सूं ईज देख-परख सकां।
अठै आ बात अखरा देवूं कै जरूरी कोनी आपां सगळां री दीठ इकसार हुवै। न्यारी-न्यारी कविता-पोथ्यां फिरोळतां म्हैं विचार करतो रैयो- किसी कविता ली जावै अर किसी छोडी जावै। बियां नन्दकिशोर आचार्य जिसा कवियां री कवितावां टाळणो, साचाणी बेजा अबखो काम हुवै। म्हारो मानणो है कै केई कवितावां री आब तो फगत मूळ भासा मांय ई मिलैला अर बां नै बीजी भासा मांय कर्यां, बा आब निजर नीं आवैला। अठै कीं आबदार कवितावां भेळी करण री कोसीस देखोला। आप आं कवितावां नै बांच’र मूळ कवितावां तांई पूगण री चावना करोला। अनुसिरजण रै मारफत जे मूळ पोथ्यां तांई पूगण री हूंस जागै तो ओ काम सवायो गिणूलां।
            कवितावां रै संचै अर अनुसिरजण सूं पैली खुद नन्दकिशोर आचार्य रै कर्योड़ा संचै अर न्यारी-न्यारी पत्र-पत्रिकावां रा आचार्यजी माथै केंद्रित अंक ई संभाळ्या। जियां— ‘संवेदन इति’ (1967), ‘चौथा सप्तक’ (1979), ‘बारिश में खंडहर’ (1996), ‘रेत राग’ (2002), ‘वाक्’ पत्रिका रो संचयन— ‘कवि का कोई घर नहीं होता’ (2009), ‘पचास कविताएँ’ (2011) आद। सगळा सूं इधकी बात कै ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ री पांडुलिपि त्यार कर्यां, सौभाग सूं खुद कवि नन्दकिशोर आचार्य सूं संचै-अनुसिरजण माथै लांबी विगतवार बंतळ करीजी। जिका सुधार अर बदळाव जरूरी हा बै कर्यां पछै ई आ पोथी आपरै हेताळू हाथां मांय पूग रैयी है। असल मांय म्हैं म्हारी बरसां ऊंडै अंधारै दब्योड़ी चावना इण संचै-अनुसिरजण रै मारफत जगजाहिर करी है। आ खेचळ कियां रैयी, इण रो फैसलो आप गुणीजणां माथै। 



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ऊंडै अंधारै कठैई (2016) संचै-अनुसिरजण : नीरज दइया
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर- 334003, पाना : 120, कीमत : 200/-
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अेक लाम्बै मिठास रै सीगै

मोहन आलोक
           हिन्दी भासा रै ‘चौथा सप्तक’ रा ख्यातनाम कवि नन्दकिशोर आचार्य री अब तांई छपियोड़ी चवदै काव्य पोथ्यां सूं टाळवीं कवितावां रो ओ महताऊ अनुसिरजण ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ जठै डॉ. नीरज दइया री अेक सांतरी उपलब्धि है, बठै ई मायड़ भासा रै अनूदित साहित्य रो अेक गीरबै जोग ग्रन्थ ई है।
          डॉ. दइया जैड़ै आगीवाण आधुनिक कवि रै, ऊंडै अंधारै कठैई, पूगण रो अैसास आचार्य जी जैड़ै कवि-रिख री आंगळी थाम’र ई संभव हो, क्यूं कै ‘अलेखू उणियारां रै बीच अदीठ’ (इतनी शक्लों में अदृश्य, आचार्य जी रो काव्य संकलन) रो छणिक दीठाव ई नीठ साधना-संभव हुवै है।
          किणी भी अनुवादक री पैली कसौटी, उण री अनुवाद सारू टाळ्योड़ी रचना हुवै। आंग्ल भासा रै ख्यातनाम अनुवादक ‘फिट्जेराल्ड’ री ऊंचाई, जेकर उण रो खैयाम री रूबायां रो अनुवाद है, तो उण सूं पैली उण री वा दीठ है जिकी खैयाम री प्रज्ञा तांई पूग’र पाछी बावड़ै। वां नै अनुवाद सारू टाळै। वां री महत्ता नै पिछाणै। डॉ. आचार्य जैड़ै सिध अर सारगर्भित कवि री कवितावां नै आपरै अनुवाद सारू टाळ’र डॉ. दइया आपरी चयन-प्रतिभा रो परिचय दियो है।
          ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ अनुवाद नै किणी भावानुवाद या अनुसिरजण री कसौटी माथै कसां तो आ इण अनुवाद री सिरैता ई कही जावैला कै ओ अनुवाद जठै मूळ कवि रै भावां नै ज्यूं रा त्यूं प्रगटै बठैई केई कवितावां रो तो शब्दश: अनुवाद ई पाठक रै साम्हीं राखै।
          आप सारू इण अनूदित कृति ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ मांय आचार्य जी रै अब तांई प्रकाशित चवदै काव्य संकलनां- जल है जहाँ, वह एक समुद्र था, शब्द भूले हुए, आती है जैसे मृत्यु, कविता में नहीं है जो, अन्य होते हुए, चाँद आकाश गाता है, उडऩा सम्भव करता आकाश, गाना चाहता पतझड़, केवल एक पत्ती ने, इतनी शक्लों में अदृश्य, छीलते हुए अपने को, मुरझाने को खिलाते हुए अर आकाश भटका हुआ सूं वां री टाळवी कवितावां लिरीजी है। बै कवितावां जिकी मांय ‘अज्ञेय’ रै सबदां मांय— ‘आंगन के पार द्वार खुलै, द्वार के पार आंगन’ अनै फेर खुलता ई चल्या जावै, अेक अधुनातन अध्यात्म री भासा मांय।

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ऊंडै अंधारै कठैई (2016) संचै-अनुसिरजण : नीरज दइया
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर- 334003, पाना : 120, कीमत : 200/-
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