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विविध पक्षों की परख नूंतता संचयन / डॉ. राजेश व्यास

राजस्थानी कहानियों की बड़ी सीमा यह रही है कि लंबे समय तक वह लोक कथाओं की बुनघट लिये रही। पर पिछले कई दशकों की राजस्थानी कहानी पर जाएंगे तो पाएंगे शैली, परिवेश और किस्सागोई में राजस्थानी कहानी ने अपनी मौलिक पहचान बनायी है। डॉ. नीरज दइया द्वारा संपादित एक सौ एक कहानियों को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि राजस्थानी कहानी किसी भी दृष्टि से भारतीय भाषाओं से कमतर नहीं है। ‘एक सौ एक कहानियां’ का यह संचयन राजस्थानी कहानी की गौरवमयी परंपरा के साथ ही आधुनिक दृष्टि और बदलते परिवेश का शिल्प समृद्ध संसार है। गांव, किसान और अकाल से जूझती जूण के साथ ही राजस्थान के बदले परिवेश, मान्यताओं और आधुनिक दीठ संजोने वाले इस संग्रह में यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, विजयदान देथा, श्रीलाल नथमल जोशी, सांवर दइया, मोहन आलोक, चेतन स्वामी, मदन सैनी, मधु आचार्य, किरण राजपुरोहित, चंद्रप्रकाश देवल, जनकराज पारीक, नवनीत पांडे, नानूराम संस्कर्ता, भरत ओला, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मदन गोपाल लढ़ा, माधव नागदा, रामस्वरूप किसान, हरीश बी. शर्मा, उम्मेद धानिया आदि कहानीकारों की वह कहानियां हैं, जिनसे राजस्थानी कहानी के ओज और नए तेवर से साक्षात हुआ जा सकता है।
इस मायने में भी यह संग्रह महत्त्वपूर्ण है कि इसके जरिए राजस्थानी कहानी के आज को गहरे से गुना गया है। राजस्थानी भाषा की समृद्ध शब्दावली के साथ ही धोरों की धरा का अतीत और बदलते परिवेश की अनुगूंज इन कहानियों में है तो दलित चेतना के साथ जीवनानुभूतियों का राग-अनुराग इसमें बांचा जा सकता है। राजस्थानी कहानी के संचयन इससे पहले भी निकले हैं पर वृहद रूप में प्रयास इसलिए भी सराहनीय है कि संग्रह के आरंभ में डॉ. नीरज दइया ने राजस्थानी कहानी के आरंभ से लेकर उसके विकास से जुड़ी पगडंडियों को अपनी सूक्ष्म आलोचकीय सूझ से अंवेरा है। इस सूझ में राजस्थानी कहानी का आलोचना पक्ष है तो आधुनिकता के बदलाव से जुड़े समय संदर्भों का लेखा-जोखा भी है। राजस्थानी कहानी की परंपरा और वर्तमान के विविध पक्षों की परख नूंतता यह संचयन भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही कहानी की भी एक तरह से विरल दीठ है।
- डॉ. राजेश व्यास
(राजस्थान पत्रिका वार्षिकी 2020)

राजस्थानी कहानी का पूरा परिदृश्य / सत्यदेव सवितेंद्र

राजस्थानी में कहानी कहने-सुनने की परंपरा बहुत पुरानी है। बातपोसी और लोककथा कागद पर उतर कर राजस्थानी भाषा और संस्कृति के समृद्ध चित्र बहुत सी भाषाओं में अनुवाद कर देश ही नहीं समूची दुनिया में पहुंची और सराहना हुई।
आजादी के साथ ही राजस्थानी कहानी में भी आधुनिक काल के बदलाव दृष्टिगोचर होने लगे। वैसे तो पहली कहानी का श्रेय शिवचंद भरतिया को दिया जाता है पर असल यात्रा मुरलीधर व्यास से आरंभ होती है। सांवर दइया की राजस्थानी कहानी को आधुनिक कहानी का प्रस्थान बिंदु माना जाता है। राजस्थानी के विद्वान आलोचक डॉ. नीरज  दइया के संपादन में आए नए संग्रह ‘101 राजस्थानी कहानियां’ में राजस्थानी कहानी के इतिहास और विकास यात्रा को एक स्थान पर संकलित करने का पुरजोर प्रयास है। इसमें राजस्थानी के नए पुराने 101 कहानीकारों की राजस्थानी कहानियों के हिंदी अनुवाद सामिल हैं। इस संग्रह में रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, अन्नाराम सुदामा, नृसिंह राजपुरोहित, रामेश्वर दयाल श्रीमाली आदि जैसे पुराने कहानीकार हैं तो इक्कीसवीं शताब्दी के युवा कहानीकार दुलाराम साहरण, कुमार अजय, अरविंद सिंह आशिया, वाजिद हसन काजी, रीना मेनारिया, किरण राजपुरोहित ‘नितिला’, हरीश बी. शर्मा आदि भी है।
इन कहानियों के माध्यम से न केवल राजस्थानी कहानी के विकास को समझा जा सकता है बल्कि राजस्थानी समाज की सामाजिक स्थिति को, उसकी विडरूपताओं को भी अंगीकार किया जा सकता है। स्त्री चेतना की नंद भारद्वाज की ‘आसान नहीं है रास्ता’, बुलाकी शर्मा की कहानी ‘हिलौर; है तो बाजारवाद के इस दौर की संवेदनाओं के क्षरण को दरसाने वाली रामस्वरूप किसान की कहानी ‘तार तार संवेदना’, ओमप्रकाश भाटिया की कहानी ‘हाथ से निकला सुख’, मधु आचार्य ‘आशावादी’ की ‘प्रेम का कांटा’ है। उम्मेद धानिया की ‘नीची जात’ दलित चेतना की प्रतिनिधि कहानी है।
नीरज दइया ने 101 कहानीकारों की प्रतिनिधि कहानियों को संकलित कर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इसकी भूमिका में कहानीकारों और उनके प्रकाशित संग्रहों के संदर्भअ दिए गए हैं, वे शोधार्थियों के लिए बहुत उपयोगी हैं। यह संकलन राजस्थानी कहानी का एक ऐसा परिदृश्य प्रस्तुत करता है जिससे एक नजर में राजस्थानी कहानी का हर पहलू समझा जा सकता है। यह संग्रह एक दस्तावेज और संदर्भ ग्रंथ है। बहुत धैर्यपूर्वक अपनी विद्वता और निर्पेक्ष दृष्टि से इसे तैयार कर हिंदी जगत के समक्ष राजस्थानी कहानी का पूरा परिदृश्य लाने के लिए भाई नीरज दइया को बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
-सत्यदेव सवितेंद्र

राजस्थान की बेहतरीन कहानियां / देवकिशन राजपुरोहित

डॉ. नीरज दइया ने राजस्थानी कहानी के पूरे परिदृश्य से प्रतिनिधि कहानियों का चयन कर उनका हिंदी अनुवाद पाठकों को ‘101 राजस्थानी कहानियां’ नामक पुस्तक में परोसा है। संपादक द्वारा पुस्तक के आरंभ में राजस्थानी कहानी के विधागत विकास को केंद्रित रखते हुए लंबी भूमिका में आद्योपांत तथ्यों के साथ अनेक निकष भी हमारे अध्ययन का आकर्षण है। संग्रह में 101 कहानियों के साथ भूमिका में आलोचना-पक्ष को भी उभारते हुए भारतीय भाषाओं के बीच राजस्थानी कहानी को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने के अनेक द्वार खोलें हैं।
समीक्ष्य ग्रंथ में आधुनिक कहानियों को चयनित और संपादित रूप में प्रस्तुत किया गया है। पांच सौ से अधिक पृष्ठों में 101 कहानियों के हिंदी अनुवाद की इस प्रस्तुति से वैश्विक फलक पर राजस्थानी कहानी की विविधता एवं वैभव का परिचय मिलेगा।
इस संकलन में राजस्थानी कहानी को अपने पैरों पर खड़ा करने वाले यशस्वी कहानीकारों में रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, नानूराम संस्कर्ता, नृसिंह राजपुरोहित, अन्नाराम सुदामा, विजयदान देथा, करणीदान बारहठ, यादवेंद्र शर्मा आदि की कहानियां शामिल हैं। अनेक कहानियों में केवल 101 कहानीकारों और प्रतिनिधि कहानियों का चयन रेखांकित किए जाने योग्य है। कुंवर रवीन्द्र के सुंदर आवरण से सुसज्जित यह संग्रह निश्चय ही राजस्थानी कहानी में ऐतिहासिक कार्य है।
-देवकिशन राजपुरोहित

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101 राजस्थानी कहानियां (कहानी संग्रह) संपादक : डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102
पृष्ठ : 504 ; मूल्य : 1100 रुपये ; संस्करण : 2019


राजस्थानी मिट्टी की सौंधी महक / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

कहानी सुनना एक बच्चे की इच्छा भर नहीं है, मूल मानवीय-स्वभाव है। कहानी की शुरुआत संभवत: तब से हुई जब आदमी ने बोलना सीखा। लोककथाओं के रूप में एक समृद्ध विरासत विश्व भाषाओं की धरोहर है जिसे हम कहानी के प्रति हजारों सालों से इंसानी प्रेम का प्रमाण मान सकते हैं। इस मामले में राजस्थानी भाषा की संपन्नता सर्वविदित है। राजस्थानी लोक-साहित्य में हजारों लोककथाएं मौजूद हैं, जिनमें परंपरा, इतिहास, भूगोल और धर्म सहित जीवन के तमाम पक्षों का अंकन मिलता है। सदियों से श्रुति परंपरा से लोग के कंठों में रची-बसी ये कथाएं अपने समय-समाज की आकांक्षाओं एवं अवरोधों का प्रमाणिक दस्तावेज है। यह कहना तर्कसंगत नहीं होगा कि राजस्थानी की आधुनिक कहानी का विकास सीधे तौर पर लोककथाओं से हुआ है, मगर आधुनिक कहानी के बीज को पुष्पित-पल्लवित होने के लिए लोककथाओं ने उर्वर जमीन अवश्य तैयार की है। राजस्थानी कहानी का इतिहास मोटे तौर पर सौ साल से ज्यादा पुराना है। राजस्थानी की पहली कहानी का श्रेय शिवचंद्र भरतिया की ‘विश्रांत प्रवासी’ को दिया जाता है। आधुनिक कहानी के विकास के पीछे कमोबेश वही कारण रहे हैं जिनसे विदेशी व देशी साहित्य में शार्ट स्टोरी विधा का विकास हुआ। राजस्थानी कहानी का वर्तमान स्वरूप तो आजादी के बाद उन्नीसवीं सदी के छठे-सातवें दशक में ही बन पाया जब मुरलीधर व्यास व नानूराम संस्कर्ता के कहानी-संग्रह प्रकाश में आए।
विगत छह-सात दशकों की यात्रा के बाद राजस्थानी कहानी जगत आज भरा-पूरा है। प्रदेश के विस्तृत भूभाग में सैकड़ों कहानीकार जग-जीवन के सच को कहानियों में विविध रूपों में ढाल रहे हैं। वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ “101 राजस्थानी कहानियां” कहानी विधा के सामर्थ्य का प्रमाण हैं। पांच सौ से ज्यादा पृष्ठों में 101 कहानियों के हिंदी अनुवाद की यह प्रस्तुति हिंदी जगत को राजस्थानी कहानी की विविधता एवं वैभव से साक्षात करवाती है। भूमिका के रूप में विद्वान संपादक का “राजस्थानी कहानी : कदम-दर-कदम” शीर्षक से शोध-आलेख कहानी की दशा-दिशा जाने के लिए अत्यंत उपयोगी और महत्त्वपूर्ण है। राजस्थानी की आधुनिक कहानी-यात्रा के विकास को चार काल-खंडों में वर्गीकृत करते हुए डॉ. दइया ने लिखा है कि कहानी के वैश्विक परिदृश्य में राजस्थानी के अनेक हस्ताक्षरों ने भारतीय कहानी को पोषित किया है। राजस्थानी कहानी भी भारतीय कहानी के विकास में कदम-दर-कदम साथ चल रही है। कहना न होगा, भारतीय कहानी का रूप-रंग भारतवर्ष की क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों से ही निर्मित होता है। राजस्थानी सहित देश की अन्यान्य भाषाओं की कथा-यात्रा को जाने समझे बगैर भारतीय कहानी के संप्रत्यय का सही रूप में आकलन करना संभव नहीं है।
इसमें संदेह नहीं है कि अनुवाद-पुल के माध्यम से भाषाओं के मध्य आवाजाही हो सकती है। अनुवाद असल में दो भाषाओं के मार्फत दो विविधतापूर्ण संस्कृतियों को नजदीक लाकर जोड़ता है। राजस्थानी से हिंदी में अनूदित ये कहानियां हिंदी के माध्यम से देशभर की हिंदी-पट्टी के करोड़ों पाठकों के साथ अन्य भाषाओं के कहानी प्रेमियों को राजस्थानी कहानी के आस्वादन का अवसर एवं मूल्यांकन दृष्ति प्रदान करती है। वरिष्ठ कवि-संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना का इस संग्रह के आरंभ में अभिमत देखा जा सकता है- “यह कृति राजस्थानी कहानी को जानने-बूझने के लिए राजस्थानी समेत तमाम भारतीय पाठकों के लिए अर्थ-गर्भी है। नीरज बधाई के पात्र हैं कि अपनी मिट्टी के ऋण को चुकाने के इस प्रयास के जरिए उन्होंने राजस्थानी कहानी को वृहत्तर लोक में ले जाने का सामयिक और साध्य उपक्रम किया है।”
संग्रह में शामिल 101 कहानीकारों में राजस्थानी की भौगोलिक विविधता का समुचित प्रतिनिधित्व हुआ है। ये कहानियां राजस्थान की सांस्कृतिक समृद्धि की परिचायक तो है ही, राजकीय सरंक्षण के बिना संघर्षरत भाषा के कलमकारों के जीवट का भी प्रमाण है। किताब के रचनाकारों की सूची देखें तो इसमें राजस्थानी कहानी को अपने पैरों पर खड़ा करने वाले यशस्वी कहानीकारों में यथा नानूराम संस्कर्ता, रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, नृसिंह राजपुरोहित, अन्नाराम सुदामा, विजयदान देथा, करणीदान बारहठ, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, बैजनाथ पंवार, श्रीलाल नथमल जोशी आदि की कहानियां शामिल हैं, वहीं कहानी को आधुनिकता के मार्ग अग्रसर करने वाले प्रमुख कहानीकारों में सांवर दइया, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मनोहर सिंह राठौड़, रामस्वरूप किसान, बुलाकी शर्मा, मालचंद तिवाड़ी आदि की कहानियां संग्रह में संकलित है। राजस्थानी के समकालीन महत्त्वपूर्ण कहानीकारों में चेतन स्वामी, भरत ओला, सत्यनारायण सोनी, मनोज कुमार स्वामी, प्रमोद कुमार शर्मा, मधु आचार्य ‘आशावादी’ आदि भी पुस्तक का हिस्सा बने हैं तो महिला कहानीकारों में चूंडावत के अलावा जेबा रशीद, बसंती पंवार, सावित्री चौधरी, आनंद कौर व्यास, सुखदा कछवाहा, रीना मेनारिया की चयनित कहानियां किताब में शामिल की गई हैं।
राजस्थानी कहानी के व्यापक और विस्तृत भवबोध को प्रस्तुत करती संग्रह में अनेक यादगार कहानियां देखी जा सकती है। ऐसा नहीं है कि यह राजस्थानी कहानी को हिंदी में ले जाने का पहला प्रयास हो, इससे पूर्व भी राजस्थानी कहानियों के हिंदी अनुवाद हेतु कतिपय प्रयास हुए हैं मगर एकसाथ शताधिक कहानियों को हिंदी जगत के माध्यम से विश्व साहित्य के समक्ष रखने का यह पहला प्रयास है। निश्चय ही इस ग्रंथ से राजस्थानी कहानी की वैश्विक उपस्थिति दर्ज होगी और सेतु भाषा हिंदी के माध्यम से अनूदित होकर राजस्थानी कहानी देश-दुनिया की अन्य भाषाओं में पहुंचेगी। कहना न होगा यह दुष्कर कार्य योग्य संपादक डॉ. नीरज दइया की कुशलता व समर्पित अनुवादकों के सद्प्रयासों का सुफल है। असल में ऐसे प्रयास अकादमियों व अन्य संसाधनों से युक्त संस्थानों को करने चाहिए, क्योंकि ऐसे कामों में अत्यंत श्रम व अर्थ की आवश्यकता होती है। इस ग्रंथ को पाठकों तक पहुंचाने के लिए के. एल. पचौरी प्रकाशन वाकई बधाई के हकदार हैं जिसने राजस्थानी मिट्टी की महक को हिंदी के माध्यम से देश-दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठाया है। कुंवर रवीन्द्र के सुंदर आवरण से सुसज्जित यह संग्रह निश्चय ही कहानी प्रेमियों के लिए संकलन योग्य उपहार है।
डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
144 लढ़ा निवास, महाजन, बीकानेर
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101 राजस्थानी कहानियां (संपादक : डॉ. नीरज दइया)
प्रकाशक : के.एल.पचौरी प्रकाशन, 8/ डी ब्लॉक, एक्स इंद्रापुरी, लोनी,गजियाबाद-201102 ; प्रकाशन वर्ष : 2019 ; पृष्ठ : 504 ; मूल्य : 1100/-

101 राजस्थानी कहानियां / मोहन थानवी

राजस्थानी कथा-यात्रा को उत्तर आधुनिक मार्ग पर अग्रसर कर रही प्रतिनिधि कहानियों का खजाना
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आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई, जादू रो पेन के साथ-साथ हिंदी-राजस्थानी के मध्य सेतु के रूप में साहित्य जगत में ख्याति प्राप्त डॉ नीरज दइया का नाम ही उनका परिचय है। डॉ दइया को अब क्षेत्रीय भाषाओं के कथा-साहित्य जगत में संकलन, संपादन और अनुवाद का एक ऐसा कोष देने के लिए पहचाना जाएगा जिसका नाम 101 राजस्थानी कहानियां है। राजस्थानी भाषा साहित्य प्राचीन विपुल निधि के लिए तो अपना कोई सानी नहीं रखता साथ ही तुलनात्मक व विवेचनात्मक दृष्टिकोण से आधुनिक साहित्य के हेतु भी किसी भी क्षेत्रीय भाषा साहित्य से कमतर नहीं है। अब राजस्थानी कहानियों की ऐसी विवेचना में इसे उत्तर आधुनिक साहित्य के प्रति भी निसंकोच किसी से पीछे नहीं, आगे ही कहा जाएगा। ऐसी धारणा व्यक्त करने के कारणों में से एक मुख्य कारण है 101 राजस्थानी कहानियां संग्रह। संग्रह में जहां दशकों पहले लिखी गई और माइलस्टोन सिद्ध हुई कहानियां संकलित हैं, वहीं 21वीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम सौपान के चलते लिखी जा रही कहानियों का प्रतिनिधित्व करती राजस्थानी कथा-यात्रा को उत्तर आधुनिक मार्ग पर अग्रसर कर रही कहानियां शामिल की गई हैं। इस संग्रह की कहानियों का संकलन एवं संपादन डॉ नीरज दइया ने किया है । सभी कहानियां अपने में अनेक विशेषताएं रखती हैं। इस संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि निर्बाध रूप से केवल कहानी को ही प्रस्तुत किया गया है । कहानीकार और कथा-सार या कथा-विषय के प्रति डॉक्टर दइया ने 20 से अधिक पृष्ठीय संपादकीय में अपने पूरे अध्ययन को सार संक्षेप में प्रस्तुत करने का एक नवाचार भी रखा है। हालांकि ऐसा नवाचार पूर्व में संकलित रचनाओं के संग्रहों में किया जा चुका है किंतु यहां नवाचार इस मायने महत्ता रखता है कि डॉ दइया ने अपनी लेखनी के जादूभरे आलेख में भाषाई कहानियों के इतिहास के साथ-साथ विहंगम दृष्टिपात हिंदी की मुख्य धारा के कथा साहित्य पर भी किया है।
संग्रह की कहानियों की शुरुआत ही केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अतुल कनक की “काचू की साइकिल” कहानी से की गई है। अतुल कनक एक लोहनिर्मित और रबड़-टायर चालित साइकिल में प्राण प्रतिष्ठा करने में तो सफल हुए ही हैं साथ ही उसकी संवेदनाओं के ज्वार में भीगी मन की बात को अपनी कलम से कागज पर उकेर लाए हैं। ऐसा ही आलम अतुल कनक की मूल राजस्थानी रचना पर छाया हुआ है। ऐसी ही प्रवृत्ति और मनोरंगों को देखने वाली आंख और श्रवण करते कर्ण छिद्रों से गहरे तक उतार देने वाली दिखने छोटी मगर गंभीर घाव कर देने वाली निशांत की कहानी है – “अखबार की चोरी”। पात्र इस कहानी को स्वयं बता रहा है । वह यात्रा कर रहा है और सहयात्री के पास मौजूद एक अखबार में अपनी फोटो छपी देख कर अखबार के पन्ने को घर ले जाने के लिए छुपा लेता है । सहयात्री अखबार के उसी पन्ने को किसी और खबर के कारण सहेज कर घर ले जाना चाहता है । वह पन्ना ना मिलने पर ढूंढता है । इसी घटना पर पाठक रोचकता से, उत्सुकता से लबरेज हो कहानी को पढ़ रहा है। अंततः पात्र स्वयं यह स्वीकारता है कि अखबार की चोरी करने का उसे पछतावा तो है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती बल्कि पाठकों को एक द्वंद्व से निकलने को मनन मंथन के लिए नई कहानियों को जन्म देती है। संग्रह की सभी 101 कहानियों पर सम्मति प्रकट की जाए तो इस 504 पृष्ठीय संग्रह से अधिक पृष्ठों का एक और ग्रंथ का सृजन हो जाएगा। कहानियों को पढ़ते हुए पाठक स्वयं को पात्रों का अंतरंग मित्र अनुभूत करता है। पाठक को ऐसा पूरा एक संसार मिलता है जो उसे अपना-सा लगता है। इस संसार की नजीर देती ऐसी कहानियों में राजस्थानी ग्रामीण अंचल को पाठक के समक्ष जीवंत उपस्थित कर देने वाले अन्नाराम सुदामा की कहानी “सूझती दीठ”, भोगे हुए यथार्थ को दृश्य दर दृश्य अनुभूत करवा देने में महारत हासिल कन्हैयालाल भाटी की कहानी “छलावा”, पात्रों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण को कथा में सूक्ष्मता से पिरो कर पाठक को मनन-मंथन करने की ओर अग्रसर कर देने वाली रचनाओं के रचयिता चंद्र प्रकाश देवल की कहानी “कोड़ा”, परंपराओं और आधुनिक परिवेश में अंतर को रेखांकित करते अपनी जड़ों से जकड़े रहने का संदेश देने वाले जनकराज पारीक की कहानी “नाम” इत्यादि कहांनियों का संगम है – 101 राजस्थानी कहानियां संग्रह । ओम प्रकाश भाटिया की कहानी “हाथ से निकला सुख” का आरंभ और शीर्षक पाठक को जो आभास देता है उससे ठीक उलट कहानी का विराम-स्थल है, जहां से इस दौर में जीवन की आपाधापी में मां-बाप से दूर जाते बच्चों को रोकने की पुकार सुनाई देती है तो साथ ही अनजान सेवक-चाकरों के प्रति अविश्वास पनपने हेतु घटित घटनाओं की गूंज भी पाठक को सचेत करती है। संग्रह की एक कहानी है, “आसान नहीं है रास्ता”। नंद भारद्वाज ने इस कहानी में अपनी शैली से कई रंग भर दिए हैं। पात्रों की मनोस्थिति को सांकेतिक संवादों से उकेरने की कला को नवांकुरों द्वारा सीखने का प्रयास नंद भारद्वाज की इस कहानी से किया जा सकता है। नजीर देखिए – ‘आपको गांव में आते ही यह बधाई किसने दे दी कि मैं किसी अनचाहे विवाद में उलझ गई हूं’ ।
साथ ही जेबा रशीद, दुलाराम सहारण, देवकिशन राजपुरोहित, देवदास रांकावत, नानूराम संस्कर्ता, बी.एल. माली अशांत, भंवरलाल ‘भ्रमर’, मंगत बादल, डॉ. मदन केवलिया, मदन गोपाल लढ़ा, मदन सैनी, मालचंद तिवाड़ी, यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, राजेश कुमार व्यास, रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत, रामस्वरूप किसान, विजय दान देथा, श्रीलाल जोशी, श्रीलाल नथमल जोशी, सांवर दइया, सावित्री चौधरी ऐसे हस्ताक्षर हैं जिनकी कहानियों का जादू सिर पर चढ़कर बोलता है। राजस्थानी की ऐसी 101 कहानियां संकलित कर उनका अनुवाद पुस्तकाकार रूप में पाठकों तक डॉ नीरज दइया ने उपलब्ध करवाया है । डॉ नीरज दइया का यह सृजन हिंदी-राजस्थानी ही नहीं वरन् तमाम भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य जगत में मील का पत्थर सिद्ध होने जा रहा है। क्योंकि डॉ दइया राज्याश्रित निकायों अथवा पूंजीपतियों के शगल स्वरूप पनपी निजी साहित्यिक संस्थाओं के मुकाबले स्व-इकाई होते हुए भी बेमिसाल नजीर के स्वरूप में इस संकलन के संपादक के रूप में अध्ययन-लेखन-परिश्रम के परिचायक एक कालजयी-सृजन को समकालीन-साहित्यिक जगत के पटल पर प्रतिष्ठित करने में सफलता अर्जित कर चुके हैं। यह सृजन इसलिए भी श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण है कि संवैधानिक मान्यता के लिए संघर्ष कर रही राजस्थानी भाषा की कहानियों की वृहद निधि में से प्रतिनिधि कहानियों का चयन करना आसान कार्य नहीं है। इस पर और भी अधिक महती कार्य यह कि इस चयनित-संकलित भंडार को अनूदित करने-करवाने का दायित्व भी डॉ. दइया ने बखूबी निर्वहन किया है। डॉ. नीरज दइया को साधुवाद । यह ठीक है कि ये सम्मति मुझ अल्पज्ञानी की है मगर यह भी विश्वास है कि निजी प्रयासों से क्षेत्रीय भाषा कथा-साहित्य जगत में संकलन, संपादन और अनुवाद का ऐसा कोष एकमेव है। मायड़ भाषा मान्यता के संघर्ष को इससे बल मिलेगा।
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पुस्तक एक नजर में-
पुस्तक का नाम : 101 राजस्थानी कहानियां (कहानी-संग्रह) संपादक- डॉ. नीरज दइया ; प्रथम संस्करण : 2019; पृष्ठ : 504 ; मूल्य-1100/-
प्रकाशक :के. एल. पचौरी प्रकाशन, डी-8, इन्द्रापुरी, लोनी, गाजियाबाद

101 राजस्थानी कहानियां / डॉ.सुधीर सक्सेना

डॉ. नीरज दइया हिंदी और राजस्थानी के समर्थ और प्रतिभाशाली रचनाकार हैं। सृजन और अनुसृजन में उनकी समान गति है। इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दौर में वह मौलिक लेखन के सशक्त हस्ताक्षर के साथ-साथ सहोदरा भाषाओं- हिंदी और राजस्थानी के मध्य सेतु बनकर उभरे हैं।
नीरज ऐसे आलोचक हैं, जो संकोच या लिहाज में यकीन नहीं रखते। वह खूबियां गिनाते हैं, तो खामियां भी बताते हैं। उनका यकीन खरी-खरी अथवा दो टूक है। उनके लिए ‘थीम’ भी मायने रखती है और सलूक भी। वह रचनाकार के सलीके को भी नजरअंदाज नहीं करते। वह अपनी बीनाई (दृष्टि) से चीजों को परखते हैं। उनके लिए शिल्प और संवेदना मायने रखते हैं, तो प्रयोगधर्मिता भी समय के यथार्थ से जुड़ना और उससे मुठभेड़ के साथ-साथ प्रासंगिकता को वे महत्त्वपूर्ण मानते हैं। गौरतलब है कि हिंदी की पहली और राजस्थानी की प्रथम कहानी लगभग असपास ही लिखी गई। शिवचंद भरतिया की 1904 में लिखी पहली कहानी के बाद लगभग एक सदी में राजस्थानी की कहानी ने बहुत कुछ सार्थक अर्जित किया है। सरकारी या गैर सरकारी संरक्षण की न्यूनता के बावजूद उसने गतिरोधों से उबरकर अपना रास्ता तलाशा और पहचान अर्जित की।
नीरज दइया की यह कृति राजस्थानी कहानी को जानने-बूझने के लिए राजस्थानी समेत तमाम भारतीय पाठकों के लिए अर्थगर्भी है। नीरज बधाई के पात्र हैं कि अपनी माटी के ऋण को चुकाने के इस प्रयास के जरिए उन्होंने राजस्थानी कहानी को वृहत्तर लोक में ले जाने का सामयिक और श्लाघ्य उपक्रम किया है।

-डॉ.सुधीर सक्सेना