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कहाणीकारां री नुंवी दीठ सूं कूंत
राजस्थानी में सातवैं दसक पछै सुखद संजोग री बात आ पण रही के नवै सिरजण रै साथै आलोचना रै आंगणै केई नुंवा लेखक सांम्ही आया, नीरज दइया रौ नांव आं नुंवा लेखकां में आपरी न्यारी पिछाण राखै। लारला बरसां में वै राजस्थानी काव्य अर कथा विधा री अंवेर-परख रौ काम लगोलग करता रह्या, पण वांनै आ बात कीं अपरोखी लागती रही के कहाणी नै लेय’र हाल तांई निजू पसंद-नापसंद, आपसी पखापखी अर आपरी निजू हासलपाई लगावण रौ भाव चालतो रह्यौ है। लोककथा सूं मुगती तौ मिळगी, पण केई जूना लेखकां नै साव बिसराय दिया तौ किणी नै हाल कांधै सूं ई नीं उतारियो। लगैटगै आ ई दसा आधुनिक कहाणीकारां नै लेय’र बरसां बण्योड़ी रही, जद के किणी बात नै बिना हासलपाई अर बिना नफै-नुकसाण री खेचल कियां निरपेख देखणौ-दिखावणौ आलोचना रौ मूळ सुभाव मानीजै। कहाणी अर कहाणीकारां माथै केंद्रित इण पोथी में बिना हासलपाई रै इणी मूळ भाव नै कायम राखण री तजवीज करीजी है। इण पोथी रै मिस जठै कीं गुमियोड़ा कहाणीकारां नै सोध’र सांम्ही लावण रौ जतन करीज्यौ है, वठै कीं नुंवा-नकोर कहाणी सिरजकां री ऊरजा माथै ई ध्यान देवणौ जरूरी लखायौ है। नीरज दइया आ बात पण मानै के जे इण काम में आलोचना रौ पख थोड़ौ पुख्ता अर पूगतौ बण्यौ रैवै, तौ निस्चै ई आ जातरा दूणै उछाव सूं आगै बध सकै। बगत माथै आलोचना री सार-संभाळ सूं नुंवा कहाणीकारां नै दसा-दिसा रा केई रंग निजर आवै। आलोचना मांय कहाणी नै आपरै बगत री दीठ सूं जांच-परख अर उण नै खुद री परंपरा में देखण-समझण रौ भाव महताऊ हुया करै अर इण दीठ सूं अठै कहाणीकार री बजाय कहाणी रै पाठ नै आधार बणावतां आ कोसीस करीजी है। इण पोथी मांय कहाणी रौ पूरौ इतिहास विगतावण री बजाय कीं कहाणीकारां री नुंवी दीठ सूं कूंत करतां वांरी सिरजणा रै मरम तांई पूगण री कोसीस करीजी है। इण अंवेर-परख में जिका रचनाकार सामिल है वांरी कहाणियां रै इण ढाळै अध्ययन सूं जठै आलोचना नै पुखता जमीन मिळै वठै ई दूजा कहाणीकारां अर पाठकां नै किणी रचना नै देखण-परखण अर खासकर उण रै अरथ तांई पूगण री आफळ अवस मिळैला।
-नंद भारद्वाज
-नंद भारद्वाज
डॉ. नीरज दइया की आलोचना-दृष्टि और सृष्टि
भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
आलोचना
बौद्धिक प्रकृति का साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म है अतः आलोचक का नैतिक
दायित्व बनता है कि वह किसी कृति की विषद व्याख्या और तात्विक मूल्यांकन
करते हुए उसमें व्याप्त बोध की अभिव्यक्ति और उसके निहितार्थ को समाने लाए।
उसका यह भी दायित्व है कि वह आज के जटिल समय में किसी कृति की समग्रता को
इस प्रकार प्रस्तुत करे कि पाठक की समझ का विकास हो और वह बिना किसी
अतिरिक्त बौद्धिक बोझ के रचना का आस्वाद ले सके। काल के अनंत प्रवाह में
कृति की अवस्थिति की पहचान ही आलोचना है।
सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है। मैं इसका हृदय से स्वागत करता हूं।
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पुस्तक : बिना हासलपाई ; लेखक : डॉ. नीरज दइया ; प्रकाशक : सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर ; संस्करण : 2014 ; पृष्ठ संख्या : 160 ; मूल्य : 240/-
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(शिविरा : नवम्बर, 2015 से साभार)
सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है। मैं इसका हृदय से स्वागत करता हूं।
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पुस्तक : बिना हासलपाई ; लेखक : डॉ. नीरज दइया ; प्रकाशक : सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर ; संस्करण : 2014 ; पृष्ठ संख्या : 160 ; मूल्य : 240/-
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(शिविरा : नवम्बर, 2015 से साभार)
कहाणी जातरा री सांतरी कपड़छांण
मदन गोपाल लढ़ा
हासलपाई बिना जोड़-बाकी को हुवै नीं तो आलोचना में हासलपाई सारू कोई ठौड़
कोनी हुवै। पण भळै ई आलोचना में हासलपाई लगावणै रो काम लगोलग चालतो रैयो
है। इण हासलपाई रै पांण ई केई लूंठा बण बैठ्या तो केई गिणती में ई कोनी
आया। चावा आलोचक नीरज दइया आपरी नवी पोथी ‘बिना हासलपाई’ री मारफत कहाणी
जातरा री कपड़छांण री खरी खेचळ करी है। आ खेचळ इण सारू महताऊ मानी जावैला कै
इण पोथी सूं केई अैड़ा कहाणीकारां रा नांव अर बां रो जस उजास में आयो है
जका बाबत अजै लग जाबक मून ही।
कैवण री दरकार कोनी कै राजस्थानी कहाणी री जातरा जित्ती लाम्बी अर रंगधारी रैयी है, आलोचना पेटै बित्ती ई सुनेड़ रैयी है। आपां जाणां कै आधुनिक कहाणी री सरुवात १९५६ में हुई जद मुरलीधर व्यास अर नानूराम संस्कर्ता कहाणी रै सीगै जमीन बणावणै रो जसजोग काम करियो। सातवै दसक पछै कहाणी री जातरा डांडी पकड़गी आधुनिकता रा पगोथिया चढतां थकां भारतीय साहित्य रै दीठाव में आपरी ठावी ठौड़ बणाय ली। बीसवीं सदी रै छेहलै दसक तांई पूगतां-पूगतां कहाणी री दुनियां कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं सवाई सांवठी हुयगी। इणरै बरक्स आपां जे कहाणी री आलोचना री बात करां तो लाम्बै बगत तांई पोथ्यां री भूमिकावां का फुटकर आलेखां नैं टाळ‘र ठंड ई रैयी। सांचै अरथां में कहाणी आलोचना पेटै पैलो पांवडो डॉ. अर्जुनदेव चारण धर्यो। कहाणी आलोचना माथै केन्द्रित बां री पोथी ‘राजस्थानी कहाणीः परम्परा अर विकास’ १९९८ में आई। चालीस बरसां सूं बेसी जूनी राजस्थानी कहाणी री जातरा री अेकठ फिरोळ रो सुतंतर पोथी रूप ओ पैलो अर उल्लेखजोग प्रयास हो। अैड़ा काम बगतसर अर पूरसल हुवता तो स्यात कहाणी रो दीठाव वैड़ो कोनी हुवतो जैड़ो आज है। आ बात आलोचना विधा साम्हीं अेक सवालियो निसान लगावै। विचारणो पड़ैला कै क्यूं पांच टणका कहाणी संग्रै रै मिस ८५ नेड़ी कहाणियां लिखण वाळा लिखारा नानूराम संस्कर्ता कहाणी जातरा में ‘आउट-साइडर’ ई रैया। क्यूं कृष्ण कुमार कौशिक आ मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ जैड़ा कहाणीकारां री कलम इक्की-दुक्की पोथ्यां सूं आगै कोनी बधी। कन्हैयालाल भाटी, मोहन आलोक आद सबळा कहाणीकार ई सावळ अंवेर नीं हुवणै सूं बगतसर पोथी रूप कोनी छप सक्या। आलोचना किणी नैं रचनाकार तो कोनी बणा सकै पण रचनाकार नैं बधावणै सारू आलोचना री महताऊ भूमिका हुया करै। कहाणी रो इतियास साख भरै कै खरी कूंत नीं हुयां कलम री कोरणी मंदी पड़ता जेज नीं लागै।
कहाणी आलोचना री कूंत करां तो तीन मोटी कमियां पड़तख दीसै- कहाणी रै पाठ री ठौड़ कहाणीकारां रै नांवां माथै ध्यान, हासलपाई लगावणै मतळब बिड़दावणै री बाण अर कूंत सारू अेकल मानदण्ड नीं हुवणो। आं कमियां रै कारण ई आलोचना किणी नैं थरपण अर किणी नै पटकण रो साझन बणगी। ओ अकारण कोनी कै कहाणी आलोचना नीं तो पाठकां रो भरोसो हासल कर पाई अर नीं लिखारां रो। आ पोथी इण छेती नैं पाटण पेटै अेक महताऊ पांवडो मानीज सकै।
इण पोथी में कहाणी आलोचना अर कहाणी री परम्परा नैं अंवेरता दो आलेख है बठैई नवा-जूना पच्चीस कहाणीकारां री कहाणी जातरां री पूरी सुथराई सूं फिरोळ करीजी है। पैलो आलेख ‘कहाणी आलोचना : बिना हासलपाई’ पोथी री भूमिका दांई है जिणमें आलोचक इण विधा पेटै अजैलग हुयोड़ै काम नैं अंवेरतां आपरी दीठ नैं साम्हीं ल्यावै। आपां जाणां कै हरेक आलोचक रा निजू राछ-पानां हुया करै, जकां सूं बो कोई रचना री परख करै। अै औजार ई उणरी समदीठ नैं अंतरदीठ सूं जोड़ै। इण आलेख में आलोचना पोथ्यां अर संपादित कहाणी संकलनां री बात करतां थकां ‘जमारो’, ‘समद अर थार’ जैड़ी संजोरी पोथ्यां रचणिया यादवेन्द्र शर्मा जेड़ै राजस्थानी मनगत रै सबळै लिखारै नैं हिंदी प्रतिमान वाळा कहाणीकार बतावणै, मनमरजी सूं जुग थरपणै, उपन्यास री ठौड़ नवल कथा सबद बरतणै रै प्रस्ताव, पोथ्यां री विगत बणावणै आद माथै आलोचक जका सवाल उठावै बै पाठक नैं ई सोचणै सारू मजबूर करै। आलोचक-संपादकां री देवळ्यां तो कोनी बणै पण बां री पखापखी पाठकां नैं भटका सकै। इणींज कारण आलोचना कारज नैं खांडै री धार माथै धावणो कैयो जावै। ‘आधुनिक कहाणीः शिल्प आ संवेदना’ सिरैनांव सूं दूजो आलेख इण विधा रै रूप-रंग माथै उजास न्हाखै। नांवी लिखारां रै ‘कोटेशन’ सूं आगै बधतै इण आलेख में ओपतै उदाहरणां सूं कहाणी रै ढंग-ढाळै री कूंत करीजी है।
नृसिंह राजपुरोहित री कहाणी जातरा माथै केन्द्रित आलेख ‘बगत रै सागै : बगत सूं आगै’ बां नै अेक टाळवैं कहाणीकार रै रूप में बखाणै। पैली ओळी मे ई आलोचक रो सफीट मानणो है कै ‘समकालीन भारतीय कहाणी मांय जे राजस्थानी सूं किणी अेक ई टाळवैं कहाणीकार नै सामिल करण री बात हुवै तो म्हारी दीठ सूं नृसिंह राजपुरोहित नै सामिल किया जावणा चाइजै। (पृ. ३१) राजपुरोहित जी री १९५१ सूं सरू हुयोड़ी कहाणी जातरा री पांच कहाणी संग्रै री मारफत फिरोळ कर’र आलेख रै अंत में आलोचक आपरी बात नैं इण भांत पोखै- ‘बिना हासलपाई अठै लिखतां म्हनैं संको कोनी कै आधुनिक कहाणी री सरूवात विजयदान देथा सूं नी कर’र आपां नै नृसिंह राजपुरोहित सूं करणी चाइजै, क्यूंकै बिज्जी लोककथावां रा कारीगर है। फगत दो-च्यार कहाणियां लिखण सूं बिज्जी नै आपां गुलेरी तो मान सकां, पण राजस्थानी कहाणी रा प्रेमचंद तो नृसिंह राजपुरोहित ई गिणीजैला।’ (पृ. ३६)
पैली पीढी रा कहाणीकार श्रीलाल नथमल जोशी री कहाणियां माथै केन्द्रित आलेख ‘जोशी थांरा पगल्या पूजूं’ में आलोचक लोक रंग, सामाजिक काण-कायदा, विषयगत नवीनता रै सागै आगाऊ सोच अर बोल्डनेस नैं रेखांकित करै। इणींज भांत ‘पाटी पढावती कहाणियां’ सिरैनांव सूं आलेख में अन्नाराम सुदामा री कहाणियां नैं सीख नै पोखणवाळी बतावै। ‘बां जीवैला अर धाड़फाड़ जीवैला’ आलेख में आलोचक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ री कहाणियां में लुगाई जात री ओळखाण बगत परवाण नुंवै ढंग-ढाळै सूं करियोड़ी बतावै। आलोचक री पीड़ है कै ‘आलोचना मांय जठै अेक बाट आपां नै सगळा खातर राखणो चाइजै, बठै तो आपां न्यारा-न्यारा राखां अर जठै आपां नै की तकलीफ हुवै नुंवा बाट सोधण री, बठै काम नै चलतै में सलटावणो चावां।’ इण आलेख में पूरै नैठाव सूं ओपता उदाहरणां सागै आ बात पुखता करीजी है कै चंद्र जी री कहाणियां में लुगाई री ओळखाण फगत देह-राग सूं बंध्योड़ी कोनी, बा बगत मुजब आपरी नवी ओळखाण सारू संभ्योड़ी दीखै। ‘कहाणियां री सळवंटा काढतो कहाणीकार’ आलेख में रामेश्वर दयाल श्रीमाली री कहाणी जातरा बाबत सांगोपांग बात करीजी है तो ‘आदमी रो सींग अर माटी री महक’ सिरैनांव सूं करणीदान बारहठ री कहाणियां री जमीन संभाळीजी है। ‘असवाड़ै-पसवाड़ै रा छोटा-छोटा सुख-दुख’ पोथी रो खास आलेख है जिणमें डॉ. नीरज दइया आधुनिक कहाणी रा हरावळ कहाणीकार सांवर दइया री कहाणी-कला माथै बात करी है। आपां जाणां कै बेटै रै रूप में सांवरजी री दुनियां सूं आलोचक रो निजू जुड़ाव रैयो है। अेक आलोचक री निजर सूं सांवर जी रै कहाणी जगत री आ जातरा जोवण जैड़ी है। इण आलेख में राजस्थानी कहाणी नैं नवी बुणगट, प्रामाणिक जीवण अनुभव, ओपती भाषा अर संवाद शैली सूं राती-माती करणै वाळा सखरा कारीगर सांवर दइया री कहाणी-कला माथै घणी सुथराई सूं विचार करीज्यो है। संवाद कहाणियां रै मिस सांवर जी जको नवो प्रयोग करियो उणनैं ‘कथा रूढ़ि बणावणै बाबत’ ‘माणक’ सारू आम्ही-साम्ही में कन्हैयालाल भाटी रै सवाल रो सांवर जी रो उथळो ‘रिमाइण्ड’ करवा’र आलोचक चोखो काम करियो है।
सांवर जी रा समकालीन कहाणीकार भंवरलाल भ्रमर री कहाणियां बाबत ‘अमूजो दरसावती कहाणियां अर सातोतूं सुख’ में आलोचक भ्रमर जी रै कहाणी जगत रो दरसाव तो करावै ई है, संपादन आ आलाचना री बिडरूपतावां नैं ई साम्हीं ल्यावै। ‘गांव री संस्कृति अर संस्कृति रो गांव’ सिरैनांव सूं ग्रामीण संस्कृति रा सबळा चितेरा मनोहर सिंह राठौड़ री कहाणी-कला री परख करीजी है। ‘नामी कवि री नामी कहाणियां’ अर ‘आत्मकथा रा खुणा-खचुणा परसती कहाणियां’ आलेखां में क्रमश: मोहन आलोक अर नंद भारद्वाज री कहाणी जातरा री परख करीजी है। आपां जाणा कै अै दोनूं लिखारा कवि रूप जाणीता रैया है पण आं री सबळी-सांतरी कहाणियां इण विधा रै इतियास नैं दूसर जांचण-पाखण री मांग करै। अनुवाद पेटै जस कमावणियां कन्हैयालाल भाटी अर रामनरेश सोनी री कहाणी कला माथै क्रमश: ‘कहाणियां मांय नुंवी भावधारा रा मंडाण’ अर ‘मानखै रै ऊजळ पख री कहाणियां’ में विचार करीज्यो है। ‘अधूरी कहाणी जातरा रा पूरा अैनाण’ सिरैनांव सूं अशोक जोशी ‘क्रांत’ री कहाणी माथै बात करता दइया लिखै- ‘कहाणी जातरा मांय नुंवा प्रयोग, नाटकीय भाषा अर साव निरवाळी बुणगट रै पाण अषोक जोषी ‘क्रांत’ लूंठै कहाणीकार रै रूप सदा याद करीजैला। (पृ. १२३)
‘अेक बिसरियोड़ै कहाणीकार री बात’ आलेख में अस्सी रै दसक में सांतरी कहाणियां रचणियां मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ री कहाणी-कला री संभाळ हुई है। इणरै सागै अैड़ा केई बीजा कहाणीकारां माथै ई न्यारै-न्यारै आलेखां में चरचा हुई है जका आलोचना रै दीठाव में लारै छूटग्या का लेखन प्रमाणै वाजिब मुकाम नीं मिल्यो। अैड़ा कहाणीकार है- रामपाल सिंह राजपुरोहित, मेहरचंद धामू, अर डॉ. चांदकौर जोशी। ‘अंतस रै साच माथै जोर’ आलेख में बुलाकी शर्मा री कहाणी कला री अंवेर करता आलोचक बां नैं बणता-बदळता संबंध अर संबंधा री थोथ उजागर करणिया कहाणीकार मानै। ‘फुरसत मांय भोळी बातां रो जथारथ’ आलेख में मदन सैनी री कहाणी दीठ री परख करीजी है। ‘सावळ-कावळ स्सो कीं राम जाणै’ सिरैनांव सूं आलेख में नीरज दइया प्रमोद कुमार शर्मा री कहाणियां नैं अरथावै तो ‘न्यारै-न्यारै हेत नै अरथावती कहाणियां’ रै मिस नवनीत पाण्डे री कहाणिया रा रंग ओळखणै री आफळ करीजी है। ‘चौथै थंब माथै चढ’र चहकती कहाणियां’ आलेख में मनोज कुमार स्वामी री सामाजिक चेतना री अंवेर हुयी है तो ‘भाषा अर बुणगट रै सीगै भरोसैमंद कहाणियां’ सिरै नांव सूं पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ रै कहाणी जगत में भाषा बुणगट अर भावगत सिमरधता री ओळखाण करीजी है। ‘दलित कहाणी रो विधिवत श्रीगणेष सिरैनांव सूं छेहलै आलेख में आलोचक नवी पीढी रा कहाणीकार उम्मेद धानियां री कहाणियां में जथारथ अर सांच नैं उल्लेखजोग बतावता लिखै कै ‘आं दोनूं पोथ्यां मांय दलिता रो ग्रामीण जन-जीवन, जातीय अबखायां, जूझ, गरीबी, कुप्रथावां, निरक्षरता, सामाजिक जुड़ाव, जनचेतना, अनुभव-जातरा, रीस अर हूंस रो पूरो लेखो-जोखो किणी दस्तावेज रूप अंवेरती कहाणियां मिलै।’ (पृ. १५७)
राजस्थानी आलोचना में आपां नैं जठै सकारात्मक भाव सांची कैवां तो बिड़दावणै रो भाव प्रमुख रैयो है बठै ई आलोच्य पोथी में खरी अर खारी कैवण री हिम्मत करीजी है। जरूरत फगत इण बात री लखावै कै आपां आलोचना नैं खुल्लै मन सूं स्वीकार करण री बांण घालां।
सार रूप कैयो जा सकै कै कहाणीकार री ठौड़ कहाणी रै पाठ री प्रमुखता, स्वस्थ आलोचनात्म्क दीठ अर आलोचना सारू ओपती भाषा इण पोथी तीन मोटी खासियत है। आलोचना विधा में आपरी पैली पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ सूं दइया जकी सखरी हाजरी मांडी, उण पछै, बिना हासलपाई’ नैं अेक लाम्बी अर अरथाऊ छलांग कैयी जा सकै। कैवण री दरकार कोनी कै इण छलांग सूं पक्कायत ई आलोचना विधा दो फलांग आगै बधी है। इण महताऊ अर जसजोग काम सारू आलोचक अर प्रकाशक नैं घणा-घणा रंग।
कैवण री दरकार कोनी कै राजस्थानी कहाणी री जातरा जित्ती लाम्बी अर रंगधारी रैयी है, आलोचना पेटै बित्ती ई सुनेड़ रैयी है। आपां जाणां कै आधुनिक कहाणी री सरुवात १९५६ में हुई जद मुरलीधर व्यास अर नानूराम संस्कर्ता कहाणी रै सीगै जमीन बणावणै रो जसजोग काम करियो। सातवै दसक पछै कहाणी री जातरा डांडी पकड़गी आधुनिकता रा पगोथिया चढतां थकां भारतीय साहित्य रै दीठाव में आपरी ठावी ठौड़ बणाय ली। बीसवीं सदी रै छेहलै दसक तांई पूगतां-पूगतां कहाणी री दुनियां कथ्य अर शिल्प री दीठ सूं सवाई सांवठी हुयगी। इणरै बरक्स आपां जे कहाणी री आलोचना री बात करां तो लाम्बै बगत तांई पोथ्यां री भूमिकावां का फुटकर आलेखां नैं टाळ‘र ठंड ई रैयी। सांचै अरथां में कहाणी आलोचना पेटै पैलो पांवडो डॉ. अर्जुनदेव चारण धर्यो। कहाणी आलोचना माथै केन्द्रित बां री पोथी ‘राजस्थानी कहाणीः परम्परा अर विकास’ १९९८ में आई। चालीस बरसां सूं बेसी जूनी राजस्थानी कहाणी री जातरा री अेकठ फिरोळ रो सुतंतर पोथी रूप ओ पैलो अर उल्लेखजोग प्रयास हो। अैड़ा काम बगतसर अर पूरसल हुवता तो स्यात कहाणी रो दीठाव वैड़ो कोनी हुवतो जैड़ो आज है। आ बात आलोचना विधा साम्हीं अेक सवालियो निसान लगावै। विचारणो पड़ैला कै क्यूं पांच टणका कहाणी संग्रै रै मिस ८५ नेड़ी कहाणियां लिखण वाळा लिखारा नानूराम संस्कर्ता कहाणी जातरा में ‘आउट-साइडर’ ई रैया। क्यूं कृष्ण कुमार कौशिक आ मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ जैड़ा कहाणीकारां री कलम इक्की-दुक्की पोथ्यां सूं आगै कोनी बधी। कन्हैयालाल भाटी, मोहन आलोक आद सबळा कहाणीकार ई सावळ अंवेर नीं हुवणै सूं बगतसर पोथी रूप कोनी छप सक्या। आलोचना किणी नैं रचनाकार तो कोनी बणा सकै पण रचनाकार नैं बधावणै सारू आलोचना री महताऊ भूमिका हुया करै। कहाणी रो इतियास साख भरै कै खरी कूंत नीं हुयां कलम री कोरणी मंदी पड़ता जेज नीं लागै।
कहाणी आलोचना री कूंत करां तो तीन मोटी कमियां पड़तख दीसै- कहाणी रै पाठ री ठौड़ कहाणीकारां रै नांवां माथै ध्यान, हासलपाई लगावणै मतळब बिड़दावणै री बाण अर कूंत सारू अेकल मानदण्ड नीं हुवणो। आं कमियां रै कारण ई आलोचना किणी नैं थरपण अर किणी नै पटकण रो साझन बणगी। ओ अकारण कोनी कै कहाणी आलोचना नीं तो पाठकां रो भरोसो हासल कर पाई अर नीं लिखारां रो। आ पोथी इण छेती नैं पाटण पेटै अेक महताऊ पांवडो मानीज सकै।
इण पोथी में कहाणी आलोचना अर कहाणी री परम्परा नैं अंवेरता दो आलेख है बठैई नवा-जूना पच्चीस कहाणीकारां री कहाणी जातरां री पूरी सुथराई सूं फिरोळ करीजी है। पैलो आलेख ‘कहाणी आलोचना : बिना हासलपाई’ पोथी री भूमिका दांई है जिणमें आलोचक इण विधा पेटै अजैलग हुयोड़ै काम नैं अंवेरतां आपरी दीठ नैं साम्हीं ल्यावै। आपां जाणां कै हरेक आलोचक रा निजू राछ-पानां हुया करै, जकां सूं बो कोई रचना री परख करै। अै औजार ई उणरी समदीठ नैं अंतरदीठ सूं जोड़ै। इण आलेख में आलोचना पोथ्यां अर संपादित कहाणी संकलनां री बात करतां थकां ‘जमारो’, ‘समद अर थार’ जैड़ी संजोरी पोथ्यां रचणिया यादवेन्द्र शर्मा जेड़ै राजस्थानी मनगत रै सबळै लिखारै नैं हिंदी प्रतिमान वाळा कहाणीकार बतावणै, मनमरजी सूं जुग थरपणै, उपन्यास री ठौड़ नवल कथा सबद बरतणै रै प्रस्ताव, पोथ्यां री विगत बणावणै आद माथै आलोचक जका सवाल उठावै बै पाठक नैं ई सोचणै सारू मजबूर करै। आलोचक-संपादकां री देवळ्यां तो कोनी बणै पण बां री पखापखी पाठकां नैं भटका सकै। इणींज कारण आलोचना कारज नैं खांडै री धार माथै धावणो कैयो जावै। ‘आधुनिक कहाणीः शिल्प आ संवेदना’ सिरैनांव सूं दूजो आलेख इण विधा रै रूप-रंग माथै उजास न्हाखै। नांवी लिखारां रै ‘कोटेशन’ सूं आगै बधतै इण आलेख में ओपतै उदाहरणां सूं कहाणी रै ढंग-ढाळै री कूंत करीजी है।
नृसिंह राजपुरोहित री कहाणी जातरा माथै केन्द्रित आलेख ‘बगत रै सागै : बगत सूं आगै’ बां नै अेक टाळवैं कहाणीकार रै रूप में बखाणै। पैली ओळी मे ई आलोचक रो सफीट मानणो है कै ‘समकालीन भारतीय कहाणी मांय जे राजस्थानी सूं किणी अेक ई टाळवैं कहाणीकार नै सामिल करण री बात हुवै तो म्हारी दीठ सूं नृसिंह राजपुरोहित नै सामिल किया जावणा चाइजै। (पृ. ३१) राजपुरोहित जी री १९५१ सूं सरू हुयोड़ी कहाणी जातरा री पांच कहाणी संग्रै री मारफत फिरोळ कर’र आलेख रै अंत में आलोचक आपरी बात नैं इण भांत पोखै- ‘बिना हासलपाई अठै लिखतां म्हनैं संको कोनी कै आधुनिक कहाणी री सरूवात विजयदान देथा सूं नी कर’र आपां नै नृसिंह राजपुरोहित सूं करणी चाइजै, क्यूंकै बिज्जी लोककथावां रा कारीगर है। फगत दो-च्यार कहाणियां लिखण सूं बिज्जी नै आपां गुलेरी तो मान सकां, पण राजस्थानी कहाणी रा प्रेमचंद तो नृसिंह राजपुरोहित ई गिणीजैला।’ (पृ. ३६)
पैली पीढी रा कहाणीकार श्रीलाल नथमल जोशी री कहाणियां माथै केन्द्रित आलेख ‘जोशी थांरा पगल्या पूजूं’ में आलोचक लोक रंग, सामाजिक काण-कायदा, विषयगत नवीनता रै सागै आगाऊ सोच अर बोल्डनेस नैं रेखांकित करै। इणींज भांत ‘पाटी पढावती कहाणियां’ सिरैनांव सूं आलेख में अन्नाराम सुदामा री कहाणियां नैं सीख नै पोखणवाळी बतावै। ‘बां जीवैला अर धाड़फाड़ जीवैला’ आलेख में आलोचक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ री कहाणियां में लुगाई जात री ओळखाण बगत परवाण नुंवै ढंग-ढाळै सूं करियोड़ी बतावै। आलोचक री पीड़ है कै ‘आलोचना मांय जठै अेक बाट आपां नै सगळा खातर राखणो चाइजै, बठै तो आपां न्यारा-न्यारा राखां अर जठै आपां नै की तकलीफ हुवै नुंवा बाट सोधण री, बठै काम नै चलतै में सलटावणो चावां।’ इण आलेख में पूरै नैठाव सूं ओपता उदाहरणां सागै आ बात पुखता करीजी है कै चंद्र जी री कहाणियां में लुगाई री ओळखाण फगत देह-राग सूं बंध्योड़ी कोनी, बा बगत मुजब आपरी नवी ओळखाण सारू संभ्योड़ी दीखै। ‘कहाणियां री सळवंटा काढतो कहाणीकार’ आलेख में रामेश्वर दयाल श्रीमाली री कहाणी जातरा बाबत सांगोपांग बात करीजी है तो ‘आदमी रो सींग अर माटी री महक’ सिरैनांव सूं करणीदान बारहठ री कहाणियां री जमीन संभाळीजी है। ‘असवाड़ै-पसवाड़ै रा छोटा-छोटा सुख-दुख’ पोथी रो खास आलेख है जिणमें डॉ. नीरज दइया आधुनिक कहाणी रा हरावळ कहाणीकार सांवर दइया री कहाणी-कला माथै बात करी है। आपां जाणां कै बेटै रै रूप में सांवरजी री दुनियां सूं आलोचक रो निजू जुड़ाव रैयो है। अेक आलोचक री निजर सूं सांवर जी रै कहाणी जगत री आ जातरा जोवण जैड़ी है। इण आलेख में राजस्थानी कहाणी नैं नवी बुणगट, प्रामाणिक जीवण अनुभव, ओपती भाषा अर संवाद शैली सूं राती-माती करणै वाळा सखरा कारीगर सांवर दइया री कहाणी-कला माथै घणी सुथराई सूं विचार करीज्यो है। संवाद कहाणियां रै मिस सांवर जी जको नवो प्रयोग करियो उणनैं ‘कथा रूढ़ि बणावणै बाबत’ ‘माणक’ सारू आम्ही-साम्ही में कन्हैयालाल भाटी रै सवाल रो सांवर जी रो उथळो ‘रिमाइण्ड’ करवा’र आलोचक चोखो काम करियो है।
सांवर जी रा समकालीन कहाणीकार भंवरलाल भ्रमर री कहाणियां बाबत ‘अमूजो दरसावती कहाणियां अर सातोतूं सुख’ में आलोचक भ्रमर जी रै कहाणी जगत रो दरसाव तो करावै ई है, संपादन आ आलाचना री बिडरूपतावां नैं ई साम्हीं ल्यावै। ‘गांव री संस्कृति अर संस्कृति रो गांव’ सिरैनांव सूं ग्रामीण संस्कृति रा सबळा चितेरा मनोहर सिंह राठौड़ री कहाणी-कला री परख करीजी है। ‘नामी कवि री नामी कहाणियां’ अर ‘आत्मकथा रा खुणा-खचुणा परसती कहाणियां’ आलेखां में क्रमश: मोहन आलोक अर नंद भारद्वाज री कहाणी जातरा री परख करीजी है। आपां जाणा कै अै दोनूं लिखारा कवि रूप जाणीता रैया है पण आं री सबळी-सांतरी कहाणियां इण विधा रै इतियास नैं दूसर जांचण-पाखण री मांग करै। अनुवाद पेटै जस कमावणियां कन्हैयालाल भाटी अर रामनरेश सोनी री कहाणी कला माथै क्रमश: ‘कहाणियां मांय नुंवी भावधारा रा मंडाण’ अर ‘मानखै रै ऊजळ पख री कहाणियां’ में विचार करीज्यो है। ‘अधूरी कहाणी जातरा रा पूरा अैनाण’ सिरैनांव सूं अशोक जोशी ‘क्रांत’ री कहाणी माथै बात करता दइया लिखै- ‘कहाणी जातरा मांय नुंवा प्रयोग, नाटकीय भाषा अर साव निरवाळी बुणगट रै पाण अषोक जोषी ‘क्रांत’ लूंठै कहाणीकार रै रूप सदा याद करीजैला। (पृ. १२३)
‘अेक बिसरियोड़ै कहाणीकार री बात’ आलेख में अस्सी रै दसक में सांतरी कहाणियां रचणियां मुरलीधर शर्मा ‘विमल’ री कहाणी-कला री संभाळ हुई है। इणरै सागै अैड़ा केई बीजा कहाणीकारां माथै ई न्यारै-न्यारै आलेखां में चरचा हुई है जका आलोचना रै दीठाव में लारै छूटग्या का लेखन प्रमाणै वाजिब मुकाम नीं मिल्यो। अैड़ा कहाणीकार है- रामपाल सिंह राजपुरोहित, मेहरचंद धामू, अर डॉ. चांदकौर जोशी। ‘अंतस रै साच माथै जोर’ आलेख में बुलाकी शर्मा री कहाणी कला री अंवेर करता आलोचक बां नैं बणता-बदळता संबंध अर संबंधा री थोथ उजागर करणिया कहाणीकार मानै। ‘फुरसत मांय भोळी बातां रो जथारथ’ आलेख में मदन सैनी री कहाणी दीठ री परख करीजी है। ‘सावळ-कावळ स्सो कीं राम जाणै’ सिरैनांव सूं आलेख में नीरज दइया प्रमोद कुमार शर्मा री कहाणियां नैं अरथावै तो ‘न्यारै-न्यारै हेत नै अरथावती कहाणियां’ रै मिस नवनीत पाण्डे री कहाणिया रा रंग ओळखणै री आफळ करीजी है। ‘चौथै थंब माथै चढ’र चहकती कहाणियां’ आलेख में मनोज कुमार स्वामी री सामाजिक चेतना री अंवेर हुयी है तो ‘भाषा अर बुणगट रै सीगै भरोसैमंद कहाणियां’ सिरै नांव सूं पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ रै कहाणी जगत में भाषा बुणगट अर भावगत सिमरधता री ओळखाण करीजी है। ‘दलित कहाणी रो विधिवत श्रीगणेष सिरैनांव सूं छेहलै आलेख में आलोचक नवी पीढी रा कहाणीकार उम्मेद धानियां री कहाणियां में जथारथ अर सांच नैं उल्लेखजोग बतावता लिखै कै ‘आं दोनूं पोथ्यां मांय दलिता रो ग्रामीण जन-जीवन, जातीय अबखायां, जूझ, गरीबी, कुप्रथावां, निरक्षरता, सामाजिक जुड़ाव, जनचेतना, अनुभव-जातरा, रीस अर हूंस रो पूरो लेखो-जोखो किणी दस्तावेज रूप अंवेरती कहाणियां मिलै।’ (पृ. १५७)
राजस्थानी आलोचना में आपां नैं जठै सकारात्मक भाव सांची कैवां तो बिड़दावणै रो भाव प्रमुख रैयो है बठै ई आलोच्य पोथी में खरी अर खारी कैवण री हिम्मत करीजी है। जरूरत फगत इण बात री लखावै कै आपां आलोचना नैं खुल्लै मन सूं स्वीकार करण री बांण घालां।
सार रूप कैयो जा सकै कै कहाणीकार री ठौड़ कहाणी रै पाठ री प्रमुखता, स्वस्थ आलोचनात्म्क दीठ अर आलोचना सारू ओपती भाषा इण पोथी तीन मोटी खासियत है। आलोचना विधा में आपरी पैली पोथी ‘आलोचना रै आंगणै’ सूं दइया जकी सखरी हाजरी मांडी, उण पछै, बिना हासलपाई’ नैं अेक लाम्बी अर अरथाऊ छलांग कैयी जा सकै। कैवण री दरकार कोनी कै इण छलांग सूं पक्कायत ई आलोचना विधा दो फलांग आगै बधी है। इण महताऊ अर जसजोग काम सारू आलोचक अर प्रकाशक नैं घणा-घणा रंग।
(`कथेसर' जन-जून 2015 में प्रकाशित)
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