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वडै सरोकारां री बाल-कहांणियां : जादू रौ पेन
-मीठेस निरमोही
नीरज दइया राजस्थांनी रै मोट्यार लिखारां में अेक मौजू ओळख अर हैसियत राखणिया लेखक है। इतरौ ई नीं उळथणहार (अनुवादक) अर संपादक रै रूप में ई वांरी गैरी पेठ मांनीजै।
“जादू रौ पेन” वां रौ पैलौ बाळ कहांणी संग्रै व्हैता थकां ईं केई खूबियां रै पेटै रचनाऊ ओप अर आब लियोड़ौ है। इण सूं पैली वां रौ अेक लघुकथा संग्रै- “भोर सूं आथण तांईं”,दो कविता संग्रै- “साख” अर “देसूंटो”, अेक आलोचना पोथी “आलोचना रै आंगणै”, पांच भारतीय भासा-साहित्य अनुवाद री अर दो संपादित पोथियां ई छपियोड़ी है।
“जादू रौ पेन” में जुदा-जुदा रोचक अर प्रेरक कथानकां सूं गूंथीजियोड़ी ग्यारा बाळ कहांणियां चित्रांमां रै सैजोड़ै छपियोड़ी है। बाळकां रै घर-परिवार-समाज अर स्कूली जीवण सूं जुड़ी नैनी-मोटी बातां अर घटणा-प्रसंगां नै लेय‘र लिखीजी अै कहांणियां बेसक ई बाळमन री संवेदणा नै गैराई में जायर परस करै। आं कहांणियां रौ परिवेस अेकदम नुंवौ अर आधुनिक है। इण सूं ई वडी बात आ है के इण कहांणियां री धूरी में बाळक है। खासकर स्कूली बाळक। कहांणीकार डॉ. नीरज दइया खुद आप मास्टर है, सो वै बाळकां रै मनोविग्यांन नै कोरौ-मोरौ जांणै ई नीं, छतापण उणरी सबळी अर सांवठी ओळखांण ई राखै। अर इणरौ बखूबी प्रयोग आं कहांणियां में होयौ है।
“जादू रौ पेन” संग्रै री कहांणियां में बाळजीवण रै परिवेस अर उणसूं जुड़ियोड़ै जुदा-जुदा पखां अर क्लास, सहपाठी, मास्टर, स्कूल, खेल, मां-बाप, नातै-रिस्तैदार, बाळक अर उणरी भूमिका इत्याद विसयां, सवालां अर आं माथै असर करणियै ततबां नै वडै मनोयोग सूं माळा रै मणियां री गळाई तार-तार पोया है। अर उतरी ई गैराई में जाय’र बाळकां रै मन री कंवळास, निछळता अर संवेदना रौ ई सैंपूरणता सूं चित्रण करियौ है। तौ कथा पात्रां रै मन री घाण-मथांण नै ई न्यारै-न्यारै रूपां में सांम्ही लाय’र कथाकार बाळजीवण री परिस्थितिजन अबखायां रौ मनोवैग्यांनिक स्तर माथै समाधान ई करियौ है । अै कथा-पात्र वडा ई विस्वासू है, जांणै अैड़ौ लागै जिकौ कहांणी में हौ रैयौ है वौ जीवन में भेरूं ई कठैई घट रैयौ है । अै कहांणियां अेकण कांनी बाळकां रै मन-मगज नै मथती थकी वांनै चारित्रिक बदळाव सारू प्रेरित करै तौ दूजै ई कांनी वां रै मनां री पड़ता नै उघाड़ती थकी वां रै तूटतै आतम-विसास अर विवेक नै बणायौ राखण रा जतन ई करै । साथै ई ओ सोच, आ चेतणा अर चिंतण के वां रौ हित किण में है अर किण में नीं है जगाय’र ई महताऊ भूमिका निभावै।
संग्रै री अै कहांणियां कोरी-मोरी उत्सुकता (बेचैनी) बधावण वाळी इज नीं है, छतापण आं रा सरोकार ई बौत वडा लागै। कहांणियां बाळकां नै मेणत अर लगन सूं पढण सारू प्रेरित करै तौ कुसंगत अर दुराचरण सूं मुगती दिराय’र वांनै रचनात्मकता सूं जोड़ै । रोज रौ काम रोज करण री सीख देवै तौ गैस पेपरां रै छळावां सूं मुगती दिराय’र नकल करण अर करावण रे पाप सूं बचावती थकी बाळकां नै आपरी समझ रै बूतै स्कूली कांम नै टेमसर पूरौ करण री प्रेरणा ई देवै। तौ उण मास्टरां रै सांतरा भचीड़ मारै जिका तनख्वाह रै रूप में मोटी रकम हासिल करियां उपरांत ई बाळकां नै पढावण में कोताई बरते अर परीक्सा रै दिनां में गैस पेपर बांट’र आपरै दायित्वां री इतिस्री कर लेवै। अेडै़ उण तमांम बाळकां नै जिकौ नांव अर इनांम रै खातिर स्कूली मैग्जीनां में दूजां री के चोरी री रचनावां आपरै नांव सूं छपावै के इण री चावना राखै, वां नै मनोवैग्यांनिक रूप सूं प्रोत्साहित अर प्रेरित कर मौलिक सिरजण करण सीख ई देवै। अेडै़ सगळा ई बालकां नै जिका आपरै मां-बाप रै डर सूं भली-भूंडी बातां लुकायनै आगै होय’र खतरां नै न्यूंतै, वां नै आपातकाळ में वडी हुंसियारी रै साथै भूमिका निभावण री अर खेल ई खेल में अकारण ई ठोकीजण अर बदळै री भावना पालण वाळै बाळकां नै खेल री भावना सूं खेल खेल’र आपसरी में मिंतराई अर सदभाव सूं रैवण री सीख देवै। इण सूं ई वडी बात आ है के अै सगळी ई कहांणियां बाळकां नै आपरी गळतियां रौ अैसास कराय’र वांनै कोरा चिंतन अर मनन सारू ई प्रेरित नीं करै, छतापण वां नै सुधरण रौ गेलौ ई बतावै ।
इण तरै चरित्र निरमांण में ई खास भूमिका निभावती अै कहांणियां बाळकां में विवेक, आतम-बळ, आतम-विसास अर संकळप-सगती नै जगाय‘र वां नै मैणत, लगन, ईमांनदारी,नैतिकता, सदाचार, नरमाई, सच्चाई, सदभाव, मिंतराई अर मेळ-मिळाप जैड़ा जीवण मोलां सू जोड़ै। तौ वां नै संवेदणसीळ, सतगुणी अनै मांनवी ई बणावै। इतरौ ई नीं हिम्मत अर हूंस बधाय’र वां नै आपरै मकसदां नै पूरण सारू तैयार ई करै।
कहांणियां रै कथ, भासा, सिल्प अर सैली री बात करां तौ सैज ई कह्यौ जा सकै के डॉ. नीरज दइया कनै अनुभवां रौ कथ रूपी अखूट खजांनौ है तौ कहांणियां सिरजण री आंट अर गत गसक ई गजब री है। भासा माथै ई वां रौ अद्भुत धणियाप है। कहांणियां री भासा रळ्यावणी अर बाळकां रै ठेठ हीयै ढूकै जैड़ी है। आपरै रचाव में कथ्य री आधुनिकता अर मौलिकता, भासाई रळकाव रै सागै कविता री सघनता अर मितव्यता अनै चित्रोपमता री ओप अर आब लियां “जादू रौ पेन” री अै कहांणियां निस्चै ई राजस्थांनी बाल-साहित्य री साख नै सवाई करै ।
अेक भेर खासियत-
इण संग्रै री सिरजणा में राजस्थांनी भासा री अेकरूपता पकायत ई थूथकौ न्हाकै जैड़ी है।
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पुस्तक : जादू रो पेन, लेखक : डॉ.नीरज दइया, विधा : बाल कहानियां, भासा : राजस्थानी, प्रथम संस्कण : 2012, मूल्य : 50 रुपए, पृष्ठ : 56, प्रकाशक : शशि प्रकाशन मन्दिर, सादाणियों की गली, मोहता चौक, बीकानेर-334005
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नीरज दइया राजस्थांनी रै मोट्यार लिखारां में अेक मौजू ओळख अर हैसियत राखणिया लेखक है। इतरौ ई नीं उळथणहार (अनुवादक) अर संपादक रै रूप में ई वांरी गैरी पेठ मांनीजै।
“जादू रौ पेन” वां रौ पैलौ बाळ कहांणी संग्रै व्हैता थकां ईं केई खूबियां रै पेटै रचनाऊ ओप अर आब लियोड़ौ है। इण सूं पैली वां रौ अेक लघुकथा संग्रै- “भोर सूं आथण तांईं”,दो कविता संग्रै- “साख” अर “देसूंटो”, अेक आलोचना पोथी “आलोचना रै आंगणै”, पांच भारतीय भासा-साहित्य अनुवाद री अर दो संपादित पोथियां ई छपियोड़ी है।
“जादू रौ पेन” में जुदा-जुदा रोचक अर प्रेरक कथानकां सूं गूंथीजियोड़ी ग्यारा बाळ कहांणियां चित्रांमां रै सैजोड़ै छपियोड़ी है। बाळकां रै घर-परिवार-समाज अर स्कूली जीवण सूं जुड़ी नैनी-मोटी बातां अर घटणा-प्रसंगां नै लेय‘र लिखीजी अै कहांणियां बेसक ई बाळमन री संवेदणा नै गैराई में जायर परस करै। आं कहांणियां रौ परिवेस अेकदम नुंवौ अर आधुनिक है। इण सूं ई वडी बात आ है के इण कहांणियां री धूरी में बाळक है। खासकर स्कूली बाळक। कहांणीकार डॉ. नीरज दइया खुद आप मास्टर है, सो वै बाळकां रै मनोविग्यांन नै कोरौ-मोरौ जांणै ई नीं, छतापण उणरी सबळी अर सांवठी ओळखांण ई राखै। अर इणरौ बखूबी प्रयोग आं कहांणियां में होयौ है।
“जादू रौ पेन” संग्रै री कहांणियां में बाळजीवण रै परिवेस अर उणसूं जुड़ियोड़ै जुदा-जुदा पखां अर क्लास, सहपाठी, मास्टर, स्कूल, खेल, मां-बाप, नातै-रिस्तैदार, बाळक अर उणरी भूमिका इत्याद विसयां, सवालां अर आं माथै असर करणियै ततबां नै वडै मनोयोग सूं माळा रै मणियां री गळाई तार-तार पोया है। अर उतरी ई गैराई में जाय’र बाळकां रै मन री कंवळास, निछळता अर संवेदना रौ ई सैंपूरणता सूं चित्रण करियौ है। तौ कथा पात्रां रै मन री घाण-मथांण नै ई न्यारै-न्यारै रूपां में सांम्ही लाय’र कथाकार बाळजीवण री परिस्थितिजन अबखायां रौ मनोवैग्यांनिक स्तर माथै समाधान ई करियौ है । अै कथा-पात्र वडा ई विस्वासू है, जांणै अैड़ौ लागै जिकौ कहांणी में हौ रैयौ है वौ जीवन में भेरूं ई कठैई घट रैयौ है । अै कहांणियां अेकण कांनी बाळकां रै मन-मगज नै मथती थकी वांनै चारित्रिक बदळाव सारू प्रेरित करै तौ दूजै ई कांनी वां रै मनां री पड़ता नै उघाड़ती थकी वां रै तूटतै आतम-विसास अर विवेक नै बणायौ राखण रा जतन ई करै । साथै ई ओ सोच, आ चेतणा अर चिंतण के वां रौ हित किण में है अर किण में नीं है जगाय’र ई महताऊ भूमिका निभावै।
संग्रै री अै कहांणियां कोरी-मोरी उत्सुकता (बेचैनी) बधावण वाळी इज नीं है, छतापण आं रा सरोकार ई बौत वडा लागै। कहांणियां बाळकां नै मेणत अर लगन सूं पढण सारू प्रेरित करै तौ कुसंगत अर दुराचरण सूं मुगती दिराय’र वांनै रचनात्मकता सूं जोड़ै । रोज रौ काम रोज करण री सीख देवै तौ गैस पेपरां रै छळावां सूं मुगती दिराय’र नकल करण अर करावण रे पाप सूं बचावती थकी बाळकां नै आपरी समझ रै बूतै स्कूली कांम नै टेमसर पूरौ करण री प्रेरणा ई देवै। तौ उण मास्टरां रै सांतरा भचीड़ मारै जिका तनख्वाह रै रूप में मोटी रकम हासिल करियां उपरांत ई बाळकां नै पढावण में कोताई बरते अर परीक्सा रै दिनां में गैस पेपर बांट’र आपरै दायित्वां री इतिस्री कर लेवै। अेडै़ उण तमांम बाळकां नै जिकौ नांव अर इनांम रै खातिर स्कूली मैग्जीनां में दूजां री के चोरी री रचनावां आपरै नांव सूं छपावै के इण री चावना राखै, वां नै मनोवैग्यांनिक रूप सूं प्रोत्साहित अर प्रेरित कर मौलिक सिरजण करण सीख ई देवै। अेडै़ सगळा ई बालकां नै जिका आपरै मां-बाप रै डर सूं भली-भूंडी बातां लुकायनै आगै होय’र खतरां नै न्यूंतै, वां नै आपातकाळ में वडी हुंसियारी रै साथै भूमिका निभावण री अर खेल ई खेल में अकारण ई ठोकीजण अर बदळै री भावना पालण वाळै बाळकां नै खेल री भावना सूं खेल खेल’र आपसरी में मिंतराई अर सदभाव सूं रैवण री सीख देवै। इण सूं ई वडी बात आ है के अै सगळी ई कहांणियां बाळकां नै आपरी गळतियां रौ अैसास कराय’र वांनै कोरा चिंतन अर मनन सारू ई प्रेरित नीं करै, छतापण वां नै सुधरण रौ गेलौ ई बतावै ।
इण तरै चरित्र निरमांण में ई खास भूमिका निभावती अै कहांणियां बाळकां में विवेक, आतम-बळ, आतम-विसास अर संकळप-सगती नै जगाय‘र वां नै मैणत, लगन, ईमांनदारी,नैतिकता, सदाचार, नरमाई, सच्चाई, सदभाव, मिंतराई अर मेळ-मिळाप जैड़ा जीवण मोलां सू जोड़ै। तौ वां नै संवेदणसीळ, सतगुणी अनै मांनवी ई बणावै। इतरौ ई नीं हिम्मत अर हूंस बधाय’र वां नै आपरै मकसदां नै पूरण सारू तैयार ई करै।
कहांणियां रै कथ, भासा, सिल्प अर सैली री बात करां तौ सैज ई कह्यौ जा सकै के डॉ. नीरज दइया कनै अनुभवां रौ कथ रूपी अखूट खजांनौ है तौ कहांणियां सिरजण री आंट अर गत गसक ई गजब री है। भासा माथै ई वां रौ अद्भुत धणियाप है। कहांणियां री भासा रळ्यावणी अर बाळकां रै ठेठ हीयै ढूकै जैड़ी है। आपरै रचाव में कथ्य री आधुनिकता अर मौलिकता, भासाई रळकाव रै सागै कविता री सघनता अर मितव्यता अनै चित्रोपमता री ओप अर आब लियां “जादू रौ पेन” री अै कहांणियां निस्चै ई राजस्थांनी बाल-साहित्य री साख नै सवाई करै ।
अेक भेर खासियत-
इण संग्रै री सिरजणा में राजस्थांनी भासा री अेकरूपता पकायत ई थूथकौ न्हाकै जैड़ी है।
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पुस्तक : जादू रो पेन, लेखक : डॉ.नीरज दइया, विधा : बाल कहानियां, भासा : राजस्थानी, प्रथम संस्कण : 2012, मूल्य : 50 रुपए, पृष्ठ : 56, प्रकाशक : शशि प्रकाशन मन्दिर, सादाणियों की गली, मोहता चौक, बीकानेर-334005
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बहुत ही सहज बाल कहानियां
–दीनदयाल शर्मा
आज के बदलते परिवेश में बच्चे भले ही इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की गिरफ्त में बंधते जा रहे हैं फिर भी अधिकांश बच्चे ऐसे भी हैं जो बाल साहित्य की रचनाओं से आनंद की अनुभूति के साथ-साथ ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा को भी शांत करते हैं। बाल साहित्य की चूंकी अनेक विधाएं हैं लेकिन कहानी विधा में बच्चे सबसे ज्यादा रूचि लेते हैं। अब जीवन की भागमभाग और एकल परिवार के कारण दादी-नानी की ओर से कहानी सुनाने की ‘वाचन परम्परा’ तो लगभग खत्म सी हो गई है। ऐसे माहौल में किसी रचनाकार की मायड़ भाषा में सृजित बाल कथा कृति यदि बाल पाठक तक पहुंचती है तो यूं लगता है मानो तपती रेत में बादलों से फुहार हो रही है। बाल मन की संवेदना को साझा करने वाले डॉ.नीरज दइया स्वयं शिक्षक है और एक शिक्षक जब बाल साहित्य का सृजन करता है तो वह रचना वास्तविकता के आस-पास महसूस होती है।
डॉ.दइया की सद्य प्रकाशित बाल कथा कृति ‘जादू रो पेन’ में बच्चों का लडऩा-झगडऩा, खेलना-कूदना, पढऩा-लिखना, छिपाना-बताना आदि अनेक क्रियाक्लापों को बाल कहानियों द्वारा बहुत ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। कार्य की नियमितता बनाए रखने की प्रेरणा देती कहानी ‘रोज रो काम रोज’, कहानी लिखने की सीख देती ‘कहाणी लिख सूं’, आपस के मनमुटाव और झगड़ों को मिटाने का मूलमंत्र देती कहानी ‘लड़ाई-लड़ाई माफ करो’, मेहनत का बल पर आगे बढऩे का भेद बताती शीर्षक कहानी ‘जादू रो पेन’, पढ़ाई में ‘शॉर्ट कट’ अपनाने वाले विद्यार्थियों की आँख खोलने वाली कहानी ‘गैस उडग़ी’ समेत ‘फैसलो’, ‘म्हैं चोर कोनी बणूं’, ‘सीखै तो अेक ओळी घणी’, ‘राजू री हुसयारी’, ‘गणित री कहाणी’, तथा ‘बरस गांठ’ भी बालमन की सरल, तरल और सहज कहानियां हैं।
चित्रकार सुनील कांगड़ा द्वारा बनाया गया पुस्तक का आवरण आकर्षक होने के साथ-साथ इसकी साज-सज्जा में राजूराम बिजारणियां का कला पक्ष भी सराहनीय है। स्तरीय कागज पर साफ सुथरी छपाई के लिए प्रकाशक भी बधाई के पात्र हैं।
डॉ.दइया की सद्य प्रकाशित बाल कथा कृति ‘जादू रो पेन’ में बच्चों का लडऩा-झगडऩा, खेलना-कूदना, पढऩा-लिखना, छिपाना-बताना आदि अनेक क्रियाक्लापों को बाल कहानियों द्वारा बहुत ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया है। कार्य की नियमितता बनाए रखने की प्रेरणा देती कहानी ‘रोज रो काम रोज’, कहानी लिखने की सीख देती ‘कहाणी लिख सूं’, आपस के मनमुटाव और झगड़ों को मिटाने का मूलमंत्र देती कहानी ‘लड़ाई-लड़ाई माफ करो’, मेहनत का बल पर आगे बढऩे का भेद बताती शीर्षक कहानी ‘जादू रो पेन’, पढ़ाई में ‘शॉर्ट कट’ अपनाने वाले विद्यार्थियों की आँख खोलने वाली कहानी ‘गैस उडग़ी’ समेत ‘फैसलो’, ‘म्हैं चोर कोनी बणूं’, ‘सीखै तो अेक ओळी घणी’, ‘राजू री हुसयारी’, ‘गणित री कहाणी’, तथा ‘बरस गांठ’ भी बालमन की सरल, तरल और सहज कहानियां हैं।
चित्रकार सुनील कांगड़ा द्वारा बनाया गया पुस्तक का आवरण आकर्षक होने के साथ-साथ इसकी साज-सज्जा में राजूराम बिजारणियां का कला पक्ष भी सराहनीय है। स्तरीय कागज पर साफ सुथरी छपाई के लिए प्रकाशक भी बधाई के पात्र हैं।
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