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भारतीय कविता री सांतरी जातरा / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा


सबद-नाद संग्रहणीय / श्रीलाल जोशी

            समय ऐसा कभी नहिं रहा जिसने जीवन को प्रभावित न किया हो। ऐसा नहीं कि उल्लेखनीय जीवन से प्रेरणा मिल सकती है। प्रेरणा अभाव-अभियोग में जिए गए जीवन से भी मिल सकती है, बशर्त देखने की आंख स्वच्थ-स्वच्छ हो। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रेरणा जीवन की विद्रूपता, विडंबना व विसंगतियों से मिलती है, लेने की कुव्वत होनी चाहिए। डॉ. नीरज दइया द्वारा चयनित-संपादित राजस्थानी भाषा की अनुवाद कृति ‘सबद-नाद’ ऊपर कथित बयान का साक्षी-दस्तावेज है।
मुट्ठी’क चावळां में
तरसै मन म्हारो...
झरै आंख्यां सूं
बेबसी रा मोती...
जे नीं लूंटा गोदाम
तो जीवां कींकर...  
            ये कवितांश किसी व्याख्या की मांग रखते हैं। किस समाज में नहीं है पेट भरने की तरस, कहां नहीं है बेबस समाज और जीने की हूंस। सच में कविवर वीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य असमिया समाज के जिस भारतीय समाज का दर्द बयान किया है, बांग्ला कवि सुनील गंगोपाध्याय की कविता में जीवन की लालसा को रेखांकित करता है। युवा कवि परिचय दास माटी की खुशबू व कामगरों को मान देते हैं। वहीं उदार-बाजार नीति की परखचे उधेड़ते हुए बताते हैं कि ‘बिकणो ही जुग री जरूरत है’ भोजपुरी कवि परिचय दास की कविता में प्रीत-रीत, रिश्ता-नाता और संवेदना पर करारा व्यंग्य है।
            ब्रजेंद्र कुमार ब्रह्म की कविता ‘मरवरण रै नांव’ बोड़ो भाषा की कविता की राजस्थानी रंगत-भाषा संस्कार दिया है अनुवादक डॉ. नीरज दइया ने। कविता का मूल सार- हियो समझै हियै रा सबद। क्या बोड़ी में मरवण चरित्र पात्र है। उसका मूल नाअम कोई और हो तो परिचय सामने आना चाहिए। डोगरी की पद्मा सचदेव वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रेम-क्रोध के बीच पिस रही जिंदगी का बयान है। असल में यह बयान भारतीय समाज से लुप्त हो रही मानवीयता, अपनापन, प्रेम व उल्लास की लोपता को उजागर करते हैं।
            बतौर बानगी ही हम उन भाषायी कविताओं को लें। ज्यों कन्नड़ देश के हालातों पर सवालियां निशान लगाती है। वहीं पर अहसास कराती है गांधी आज भी प्रासंगिक है। मैथिली कविता में जहां टूटती घर-गृहस्थी के दर्द को उकेरा है। मलयालम कवि विश्वास जगाता है- चिमठींक प्रीत बदळै/ स्सौ कीं पाछौ मिळ सकै....  वहीं मणिपुरी कविता- टाबरां री छात्यां बणगी / सिपाहियां री खुराक.... / लुगाइयां रा डीळ/ तलवार अर छुरी परखण री ठौड़... आदिवासी सामाजिक राजनीति का मर्मांत व वेदना-संवेदना की गाथा है।
            वस्तुतः संचयनित अनूदित भाषायी कविताएं तत्संबंधि समाज की तासीर-तेवर का परिचयात्मक दस्तावेज भर नहीं है। इस मिशन पर यह कहना उचित होगा कि प्रतिनिधि स्वर हैं।
            यह तथ्य कहीं भी उजागर नहीं होताअ है कि ‘सबद-नाद’ में अनूदित, चयनित कविताओं का मूल भाषा स्रोत क्या है? यदि ये कविताएं मूल भारतीय भाषाओं से राजस्थानी भाषा में अनूदित है तो राजस्थानी भाषा साहित्य जगत के लिए सुखद संकेत है कि इन्हीं भारतीय भाषाओं ने राजस्थान की भाषा की रचनाओं को संप्रक्षेपित करने का सेतु-हेतु व साधक मिल गया है। यदि अनूदित कविताएं हिंदी या अन्य किसी भाषा के जरिए भी राजस्थानी में पेश हो रही हैं तब भी ये मूल राजस्थानी सी लगती है। दोनों ही स्थिति में डॉ. नीरज दइया साधुवाद के पात्र हैं। अकादमी का धन-प्रयास बेकार नहीं गया है। कृति पठनीय है आलोचकीय दृष्टि को परे रखें या साफ रखें, तब भी। अंतरपट में चंद्रप्रकाश देवल का बतौर अनुवादक परिचय उसकी साख को ग्रसित करता है। क्यों जरूरी लगा यह समझ के दूसरे छोर से तो यह बात समझ में नहीं आती है, परंतु अनुवाद-अकादमी को अंतरपट उठाकर सच उजागर करना चाहिए कि यह पैबंद मक्खन की कारी-कुरपी अनुचित क्यों नहीं जान पड़ी। सबद-नाद संग्रहणीय है।
श्रीलाल जोशी

सबद-नाद / विधा : अनुवाद / अनुवादक : नीरज दइया / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर संस्करण : 2012 / मोल : 70 रिपिया।

हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर…

डॉ. मदन सैनी
राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर रै सैयोग सूं छपी थकी पोथी ‘सबद-नाद’ मांय भारत में बोली जावणवाळी चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रो अनुवाद करियो है- राजस्थानी रा ऊरमावान कवि, अनुवादक अर समीक्षक डॉ. नीरज दइया। इण संग्रै मांय समकालीन भारतीय कविता आपरै सैंपूर सबद-नाद रै समचै पाठकां सूं रूबरू होवै अर अेक लूंठै फलक माथै मानव-मन रा जथारथ चितराम उकेरै। आं कवितावां में जठै राग-रंग री रूपाळी छिब है, बठै ईज जियाजूण री अंवळायां-अबखायां आपरै जमीनी जथारथ सूं बाथेड़ो करती पण लखावै। असमिया कवि वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य सिंझ्या नैं ‘उदासी दाईं’ उतरती देखै, बठै ईज चाय-बागानां अर धूवां बगावती चिमनियां नैं ई नीं भूलै! ‘मुट्ठी’क चावळिया’ कविता में बै कैवै :
हाय! मुट्ठी’क चावळियां खातर
तरसतो रैयग्यो म्हारो ओ मन
इण संग्रै नैं पढ्यां पछै कीं अैड़ा ईज भाव अंतस में उठै। इण कविता रै समचै म्हैं कैवणो चावूं कै संग्रै री सैंग कवितावां किणी-न-किणी दीठ सूं पाठक री चेतना नैं झकझोरै, नवी दीठ देवै अर नवै सोच सूं सराबोर पण करै। आं कवितावां मांय सांस्कृतिक छिब है- कागलै रो सराध (कोंकणी), बठै ईज बाजारवाद रा सुर भी है- मोल लावो प्रीत-अपणायत (भोजपुरी), तो बीजै कानी सिणगारू भावां री रूपाळी सोभा पण है- मरवण रै नांव (बोड़ो)। आं कवितावां मांय देस-दुनिया अर घर-परिवार रा सांवठा बिंब-पड़बिंब होवता लखावै। मैथिली री ‘घर’ कविता री अेक बानगी जोवो :
घर घर ही हुवै
हुवो बठै भलांई लाख अबखायां
जठै मा हुवै
उडीकती थकी आपरी
बूढी अर थाकल आंख्यां सूं-
भूख अर दरद सूं आकळ-बाकळ
खुद रै बेटै नैं
उडीकती थकी मा।
अठै आपां अनुवादक री भासाई खिमता नैं भी परख सकां, जकी झरणै रै कळ-कळ नाद री दांई सबद-नाद रै समचै अेक जाण्यो-पिछाण्यो जथारथ-बिंब आपां रै पाखती ऊभो करै। इत्तो होवतां थकां ईज अेक बात उल्लेखजोग है अर वा आ है कै इण अनुवाद सूं पैलां नीरज दइया री भासा ‘ओकारांत’ होया करती, पण इण संग्रै में पैली बार (स्यात् डॉक्टरेट रै कारण) ‘औकारांत’ होयगी है। इण सारू अनुवादक नैं कठैई अेक टीप देवणी चाहीजती, नींतर आ भासा-शैली किणी बीजै अनुवादक री कैयी जाय सकै। अेक और विचारजोग बात है कै इण पोथी मांय भेळी करीज्योड़ी चौईसूं भासावां री कवितावां रो उल्थो उणां रै मूळ रूप सूं अनुवादक करियो है, का पछै किणी बीजी भासा रै माध्यम सूं ओ अनुवाद पाठकां साम्हीं परतख होयो है, इण बात रो खुलासो भी होवणो चाहीजतो। नींतर इत्ती भासावां री जाणकारी किणी उल्थाकार नैं होय सकै, आ इचरज री बात नीं है कांई? केई ठौड़ प्रूफ री भूलां भी है, जियां- साम्हीं, सामीं/ जोसेफ मेकवान, योसेफ मेकवान/ बदूंक/ कह्यां/ गोली (गोळी) इत्याद। फेर भी असमिया, बांग्ला, भोजपुरी, बोडो, डोगरी, अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयाळम्, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उडिय़ा, पंजाबी, संस्कृत, संताली, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू इत्याद चौईस भासावां री टाळवीं कवितावां नैं सहेजणो अर वांरी काव्याभासा नैं जीवणो कोई हांसी-खेल नीं है, इण कारज में उल्थाकार री साधना सुथराई सूं परतख होवती लखावै। कवियां रै परिचय सूं पैलां ‘अंतरपट’ री कांई दरकार ही, उल्थाकार ई जाणै! फेर भी नीरज रो ओ अनुवाद भासाई अेकरूपता री दीठ सूं सरावणजोग कैयो जाय सकै। म्हारी हियै-तणी बधाई!


पोथी : सबद-नाद / विधा : अनुवाद / अनुवादक : नीरज दइया / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर संस्करण : 2012 / मोल : 70 रिपिया।
(जागती जोत : अगस्त-सितम्बर, 2012)

सबद-गूंज

 कुंदन माली
      भारत सरीखा बहुभासायी, बहुसांस्क्रतिक देस में, मौजूदा इक्कीसमै सइकै में साहित्य रै साम्हीं घणकरी चुनौतियां अर दबावां नै मैसूस कर्‌या जाय सकै अर साथै ई साथै आ बात ई दीवा री भांत साफ है के किणीं देस री साहित्यिक कारण है के साम्प्रत समै में साहित्य री नवी भंगिमावां अर नवा रूप ई साम्हीं आवता जाय रह्‌या है। समकालीन राजस्थानी साहित्य रै परिपेख में आ बात सुभट तौर सूं कैयी जाय सकै के भलांई कमती तादाद में व्हौ, पण आपां री नवी पीढ़ी रा लिखारा राजस्थानी साहित्य री न्यारी-न्यारी विधावां में सिरजण करण री दीठ सूं लगौतार सक्रिय निंगै आवै। जठै आपां रै साहित्य में कहाणी अर कविता रै खेतर में खासौ मैताऊ काम व्हियौ है तो दूजी कानीं कईक विधावां ई समरिद्ध होवती रैयी है- ज्यूं के जातरा-विरतांत, लघुकथा, नाटक, आलोचना इत्याद रै साथै-साथै संस्मरण अर सबद चितराम ई खासी ठौड़ बणाय रैया है। अठै आ बात केवणि ई वाजिब लखावै के सिरजाणाऊ लेखन रै साथै-साथै किणीं भासा री सामरथ अर संभावनावां री असली कसौटी उण भासा में होवण वाळा उल्था माथै ई आधार राखै। असल में देखां तौ किणीं ई भासा री विपुल सामरथ अर सबद-भंडार नै बधावण रौ काम अनुवाद कर्म रै मारफत संभव व्है। भासा री साहित्यिक गेराई, विविधता अर विपुलता रौ मापदंड अर रचनाकार-अनुवादक री रचनात्मक कारीगरी नै अनुवाद रै जरिये इज मापी जाय सकै।
       अंजस  अर गुमेज री बात है के लारला पच्चीस-तीस बरसां में राजस्थानी साहित्य में खासी तादाद में अनुवाद रौ काम-काज व्हियौ है अर स्तरीय काम व्हियौ है। गुजराती, पंजाबी, बांग्ला, मराठी, डोगरी, कश्मीरी, मौथिली, हिंदी, उड़िया, असमिया अर मलयालम इत्याद भारतीय भासावां री प्रख्यात क्रतियां रा उल्था व्हिया है। इत्तौ इज नीं, अंग्रेजी, फ्रेंच, रसियन अर जरमन सरीखी विदेसी भासावां री रचनावां ई राजस्थानी में ठसकै सूं अनूदित व्ही है अर रास्ट्रीय स्तर माथै बरौबर आदरीजी है।कविता, कहाणी, उपन्यास, आलोचना अर दूजी साहित्यिक विधावां रौ उल्थौ इण बात री साख भरै के राजस्थानी साहित्य में अनुवाद रौ भंडार खासौ रातौ-मातौ है।
       साहित्य अकादेमी नवी दिल्ली रै राजस्थानी भासा परामर्श-मंडल री भूमिका इण सीगै घणी सरावणजोग रैयी है अर केवण री जरूत कोनीं के साहित्य अकादेमी रै लगौलग प्रोत्साहन रै पांण केईक नवा उल्थाकार साम्हीं आया है। साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार अर राजस्थानी भासा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी बीकानेर रा अनुवाद पुरस्कार सूं इण काम ने बेसक तेजी मिलती रैयी है। देस अर विदेस रा तमाम नामचीन रचनाकारां री रचनावां रै साथै साथै काळजीत रचनावां रा उल्था ई राजस्थानी भासा री खिमता री साख भरै। अनुवाद रै जरियै देस-देसावर री भासावां री उत्तम रचनावां नै राजस्थानी में लावण रौ काम यूं देखां तौ समकालीन राजस्थानी साहित्य नै समरिद्ध करण रौ काम इज बाजैला। जूनी अर नवी पीढ़ियां रा लेखक इण अनुवाद-यग्य में आपरौ योगदान देय रैया है।
       नवी पीढ़ी रा लिखारा नीरज दइया री दिलचस्पी कविता, लघुकथा अर आलोचना कर्म में तो है ईज, पण इण रै साथै ई साथै अनुवाद रै कामकाज में ई वां री रुचि बराबर निंगै आवती रैयी है। पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम रै कविता-संग्रै “कागद अर कैनवास” अर हिंदी कथाकार निर्मल वर्मा री कथा-पोथी “कागला अर काळो पाणी” रा नीरज दइया राजस्थानी में मेताऊ उल्था करिया है अर राजस्थानी भासा री मठोठ री वां नै विवेकसम्मत समझ है अर भासा रै सिरजाणात्मक उपयोग री दीठ सूं ई वै सावचेत अर सजग निंगै आवै। इणींज सिलसिलै में नीरज दइया “सबद नाद” नाम रै मैजूदा काव्य-संग्रै साथै मैजूद व्हिया है। देस री चौईस भासावां रै टाळवां कवियां री टाळवीं कवितावां रै इण संग्रै में भारतीय कवियां री गिणी-चुणी कवितावां रौ उल्थौ सामिल है। कविता रै मारफत नीरज दइया राजस्थानी कविता अर अनुवादकर्म रा जसजोग नुमांइदा कवि देवल रै योगदान नै आदर साथै रेखांकित कर्‌यौ है।
       अलबत जिण कवियां नै अठै ठौड़ मिली है वां में सूं इस्या ई कवि है, जिका सूं सवाया कवि उण भासा में मौजूद है, पण इण बात में कोई संका नीं है के जिण कवितावां नै अनुवाद चुणीं है, वै भासा-सिल्प-सौस्ठव अर परिवेस रै स्तर माथै रत्तीभर ई कमजोर नीं है। अनुवादक अर संपादक रै विवेक मुतालिक ओ ईज केवणौ वाजिब है के साहित्य री दुनिया लोकतंत्रिक दुनिया है अर इण दुनिया में एक दूजै री पसंद-नापसंद रौ समांन व्हैणौ इज चाईजै।
       कुंदन मालीसमकालीन भारतीय समाज, परिवेस, परम्परा अर न्यारै-न्यारै प्रदेसां रै संवेदनात्मक अर सिरजणात्मक भूगोल अर आबोहवा नै इण संग्रै में मौजूदा कवितावां रै मारफत आसानी सूं मैसूस करी जाय सकै। दूजै सबदा में केवां तो “सबद नाद” रै रूप में आपां रै साम्हीं एक इस्यौ केलिडोस्कोप है जिण नै समकालीन भारतीय कविता री एक गंभीर, सारथक झांकी पेस करण री उल्लेखजोग कोसिस रै तौर माथै देखी जावणी चावै। अनुवादकर्म असल में अनुसिरजण रौ कर्म है अर जद कोई कवि खुद इज कवितावां रै अनुवाद नै हाथ में लेवै तौ वो अनुवाद कर्म सांचा अर्थ में सिरजाणात्मक अनुवाद बण जावण री खिमता दरसावै। नीरज दइया आपरी इण मेताऊ कोसिस रै तैत कवियां रै अंतस ताईं पूग नै, कविता रै मर्म नै ओळखण उण नै आपरी भासा में ढाळै अर नतीजा में आपां नै सम्प्रेसणीय, सिरजणात्मक अर संवेदनसील कवितावां मिलै।
       “सबद नाद” राजस्थानी पाठक-समाज रै बीच आप री गैरी पैठ थरपैला अर आवण वाळा अनुवादकां नै प्रोत्साहित करण रौ काम करैला।
(“सबद-नाद” पोथी री भूमिका)


पोथी : सबद-नाद / विधा : अनुवाद / अनुवादक : नीरज दइया / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर संस्करण : 2012 / मोल : 70 रिपिया।