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मौन को मुखरित करता रचनाकर्म : उचटी हुई नींद

संजय आचार्य ‘वरुण’
             सामान्य तौर पर कविता कर्म को जितना सरल माना जाता है वास्तव में यह उतना ही नहीं बल्कि उससे अधिक जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण काम है. दरअस्ल कविता हमारे भीतर का वह सत्य होती है जो हमारे अन्य सभी माध्यमों से अभिव्यक्त होने के बाद भी कहीं अव्यक्त रह जाती है. इसे कविता की कसौटी भी माना जा सकता है कि जो अन्य किसी भी माध्यम से प्रकट नहीं की जा सके, कविता मानव मन की उन्हीं अनुभूतियों का सतरंगा कोलाज होती है. पुन: पुन: कविता लिखने की आवश्यकता को भी इन्हीं सन्दर्भों में समझा जा सकता है. रघुवीर सहाय अपने कविता संग्रहों की भूमिकाओं में लगभग हर बार यह लिखा करते थे कि- पिछली कविताओं में बहुत कुछ छूट गया था. उस काल की कविताओं में मैं दो नहीं लिख पाया, वह मैंने अब लिखने की कोशिश की है.
           हर बार कुछ छूट जाना, अनकहा रह जाना ही निरन्तर लिखते रहने की अनिवार्यता को अस्तित्व प्रदान करता है. डॉ. नीरज दइया साहित्य की सभी प्रमुख और प्रचलित विधाओं में अधिकार पूर्वक लिखते हैं. लेकिन इतना सब कुछ लिखने- रचने के बाद भी जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण उनके भीतर शेष रह जाता है वही उनकी कविताओं के रूप में सामने आता है.
             'उचटी हुई नींद' कविता संग्रह को पढ़ने के बाद मुझे अपने आप से जो पहली प्रतिक्रिया प्राप्त होती है, वह यह है कि नीरज दइया मौन को मुखरता देने वाले कवि हैं. मौन को मुखरता देने का मेरा आशय यहां यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में अनगिनत अनुभूतियों को अपने अंदर संकलित करता है लेकिन अधिकांश बार उन अनुभूतियों को कहना, लिखना, बयान करना तो दूर, उन्हें ठीक तरह से समझ पाना भी सबके लिए संभव नहीं होता. वे अनुभूतियां हमेशा मौन ही रह जाती हैं. डॉ. नीरज दइया कवि के रूप में उसी मौन का सिरा पकड़ कर बाहर खींच लाते हैं. इसे हम उनकी काव्याभिव्यक्ति में मौलिकता 'Originality in Poetic Expression' का आधार, कारण या रहस्य मान सकते हैं.
उचटी हुई नींद कविता संग्रह में कविताओं के विषयों की दृष्टि से बहुत अधिक विविधता नहीं है. संग्रह का मूल स्वर प्रेम को स्वीकार किया जा सकता है. एक रचनाकार और आम आदमी में प्रेम को लेकर बहुत महीन सा अंतर होता है, वह स्वाभाविक रूप से नीरज जी के यहां भी है. आम आदमी प्रेम करता है और रचनाकार उसे गोपनीय ढंग से जीते हुए बहुत शिद्दत से महसूस भी करता है. 'प्रेम का समय' कविता की अाख़िरी पंक्तियों में नीरज कहते हैं- समय से पहले का प्रेम/और समय के बाद का प्रेम/ होता है कष्टकारक/ ठीक समय पर/ होता ही नहीं प्रेम. (पृ.64). किसी का किसी की स्मृतियों में रहना या आना एक बहुत सामान्य सी क्रिया होती है लेकिन कवि ने इसे बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है- तुम्हारी स्मृति/ अभी तक नहीं भूली/मुझ तक पहुंचने के रास्ते.(पृ. 67)   मानव के जीवन में जब प्रेम का आगमन होता है तो उसके देखने, सोचने और समझने के सभी कोण बिल्कुल बदल जाते हैं. उसकी दृष्टि में एक अघोषित कलात्मकता आ जाती है. आदमी जिस रंग के कांच वाला चश्मा पहनता है उसे सब चीजें उसी रंग की प्रतीत होती हैं. प्रेम भी एक ऐसा चश्मा है जिसके चढ़ने पर सब कुछ प्रेममय ही दिखाई देता है. कवि ने इस कोमल भाव को कुछ इस तरह से अभिव्यक्त किया है- प्रेम से पहले/ था आकाश में चांद/ मैंने देखा नहीं/ जब देखा/ दिखा नहीं ऐसा/ दिख रहा है अब जैसा. (पृ. 32)  प्रेम की तीव्रता का अनुभव बड़ा विचित्र होता है. सामान्यतया लोग उसे देह से जोड़कर समझते हैं लेकिन वास्तव में प्रेम की तीव्रता का सम्बन्ध आत्मा से होता है. विशुद्ध प्रेम की आत्मीय तीव्रता को समझने के लिए नीरज जी की इस कविता बेहतर अवसर प्रदान करती है- प्रेम करने के लिए/ लगाए सात चक्कर/ अग्नि केवल/ साक्ष्य रूप/ सामने नहीं थी/ वह थी देह में भी/ जलकर/ हम हुए एक/ होंगे जुदा/जलकर ही. (पृ.41)
          इस संग्रह में श्री नीरज दइया ने प्रेम को संवेदना के कई- कई स्तरों पर आकर महसूसते हुए अनेक हृदय स्पर्शी कविताएं पाठक को सौंपी है. संग्रह का दूसरा मुख्य स्वर एक सृजक की सृजनात्मक प्रवृतियों और प्रक्रियाओं को उद्घाटित करता है. कवि शब्द की सत्ता, गरिमाऔर सामर्थ्य से बहुत गहरे तक प्रभावित है. वे शब्द को सदैव अपने इर्द- गिर्द और अपने साथ ही पाते हैं. वे शब्द को बहुत अपनापे के साथ अनुभव करते हैं- ऐसे में कुछ शब्द/ हो जाते हैं नाराज/मैं अटक जाता हूं/ उनके पास कहीं करीब/ शब्द हैं तो सही/ पर शायद नींद में है/ या कहीं चले गए हैं दूर/ कुछ शब्द और मैं/ खड़े हैं विरह में मूर्तिवत/ खामोश- उदास, सुस्त से.(पृ.20)  पुस्तक की तीन आखिरी कविताएं 'पूर्वज, पापड़,विवश' जिन्हें गद्य कविता के रूप में पहचाना जाता है, में कवि ने अपनी वैचारिक क्षमताओं का अभूतपूर्व परिचय दिया है. एक बानगी देखिए- ' हमको जब दफनाया जाएगा..मिट्टी में मिलकर..करेंगे हम पृथ्वी से प्रेम..कण कण में समाने की यह एक विचित्र यात्रा होगी..आग में जलकर बसेरा करेंगे..आग में बनकर एकरंग और अपने अवशेषों के साथ जल में मिलकर  हम एक दिन पुन: प्रवेश करेंगे हमारे प्रियजनों के भीतर.' (पृ.77)
इन काव्य पंक्तियों की ऊंचाई से पता चलता है कि कवि न केवल अपने खुद के धरातल पर है बल्कि आयुर्वेद और शरीर शास्त्र की मान्यतानुसार अपने सूक्ष्म शरीर या अवचेतन मन के जरिये सृष्टि के अनुभव लेकर स्वयं में लौटे हुए इंसान हैं. यहां पर प्रसिद्ध जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के याद आते हैं जिन्होंने अपने पत्र संग्रह-पत्र युवा कवि के नाम- में लिखा है कि ' अपने में लौट आओ, उस कारण को ढूंढ़ो जो तुम्हें लिखने का आदेश देता है'  रिल्के की तरह नीरज जी ने भी प्रेम,अवसादऔर अदृश्य को आपस में ऐसा पिरोया है कि ये सभी बातें एक-दूसरे की पूरक महसूस होती हैं. 'उचटी हुई नींद' बहुत भावुक मन का दस्तावेज है, इसलिए कुछ कविताएं केवल लिखने के लिए लिख दी गई प्रतीत होती हैं. उदाहरण के लिए ' कुछ सपने और' (पृ.22) का उल्लेख किया जा सकता है. बहुत सारी यादगार और पाठक को गहरे तक छूने वाली कविताएं इस संग्रह का हासिल है. डॉ. नीरज दइया को बधाई की वे कविता का अपना मौलिक मुहावरा गढ़ने में सफल हुए हैं.

लोक संस्कृति के कवि डॉ. नीरज दइया

राजेंद्र जोशी
        हमारे समय के कवि आलोचक डॉ. नीरज दइया को लोक-संस्कृति का कवि कहने से मेरा अभिप्राय उनकी कविताओं में लोक का संपोषण एवं प्रतिष्ठा के लिए हुई अभिव्यक्ति है। काव्य-कृति "उचटी हुई नींद" में डॉ. दइया ने लोक का दर्द समझते हुए कविताओं की विषय-वस्तु में समाहित किया है।
        कविता-लोक में उनका रचाव एक ऐसी लोक-आत्मा को निर्मित करता है जो एक जिम्मेदार और सजग रचनाकार होने की अनिवार्य शर्त मानी जानी चाहिए। लोक के विविध पक्षों में विगसाव के लिए बेचैन कवि अपने जिस आत्म पक्ष को प्रस्तुत करते हैं वह मानो समस्याओं के समाधान नहीं वरन भोगे हुए यर्थाथ और अनुभूत सत्य जैसा है। अनुभव और अनुभूतियों का गहरा समन्वय इस संग्रह में अनेक स्थलों पर प्रकट हुआ है। प्रेम ही वह अवयव है जो प्राणियों को जिंदादिल बनाएं रखता है। कविताओं में प्रेमी हृदय की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्तियां जैसे इस संग्रह के प्राण है। बिना प्रेम के कुछ भी नहीं होता जैसी काव्य पंक्तियों का मर्म है कि बिना प्रेम के मुरझा जाते हैं रंग, उड़ जाती है खुशबू और खो जाती है हंसी बिना प्रेम के। आज की इस बदलती दुनिया में ये कविताएं इन सभी घटकों को बचाए और बनाए रखने का जैसे साक्ष्य भी प्रस्तुत करती हैं। निजी और अंतरग संबंधों की इन कविताओं में जहां नितांत निजता है वहीं सरज, सरल और प्रवाहमयी भाषिक रचाव भी पाठोपरांत स्मृति में सदा बना रहने वाला है। पाठकों के दिलों में रिश्ता बनाने वाली इन कविताओं के लिए डॉ. नीरज दइया को बधाई।

प्रेम और जीवन के जागरण में ‘उचटी हुई नींद’

–नवनीत पाण्डे
नींद उचटती क्यों हैं और जब उचटती है तो उस समय मन में आने वाले भावों- विचारों के स्थूल भाव में देखते हुए ’उचटी हुई नींद’ का पाठ असंभव है, पाठक को निराशा ही हाथ लगेगी क्योंकि उचटी हुई नींद का आद्योपांत स्थूल चराचर से कोई लेना- देना नहीं है…..राजस्थानी के युवा सशक्त हस्ताक्षर कवि- आलोचक- सम्पादक  डॉ. नीरज दइया की बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित पहली हिन्दी काव्य कृति ’उचटी हुई नींद’ की कविताओं की सारी  अनुभूतियां बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की यात्रा है और यह यात्रा इतनी सरल भाषा-शैली, शिल्प में किंतु सघन और आंदोलित करनेवाली है कि लगता ही नहीं कि यह कवि की पहली काव्य कृति है, इसकी झलक पहली ही कविता में देखिए…..
 ’शब्दों के नहीं,
होती है आंख कवि के
शब्द सपना नहीं देखते
जानते हैं आप
कवि देखता है सपना
कविता में कविता का
अपनी आंख को शब्दों की आंख बना कविता में कविता के सपने देखनेवाले नीरज दइया की हिन्दी कविता की दुनिया में ये पहली दस्तक ’उचटी हुई नींद’..की अधिकतर कविताओं की नन्ही- नन्ही मगर बहुत सघन अनुभूतियों की ऎसी झपकियां हैं, जिनका उत्स स्वप्न-यथार्थ के बीच उहापोहों की आंख- मिचौली है जिस में कवि-कविता, प्रेम के विराट- सूक्ष्म स्वरूप के साक्षात दर्शन होते हैं।
कवि की कलम में कविताएं रंगीन तितलियों सी आती है और वह बताती है कि कविता किसी कवि के नाम में नहीं.. कविता के अपने पाठ में होती है, पाठ भी ऎसा जिस में शब्द चित्र बनते जाते हैं जो पाठक की चेतना को जागृत करते हुए उसके समक्ष अपने समय के सत्य को उद्घाटित करते हैं। अर्थ के अथाह जंगल में बिखरे हुए कांटों, दलदल  उनके शब्दों का दल कवि को आमंत्रित करता है और वह इस आमंत्रण को चुनौती के रूप में स्वीकार करता है और कहता है,
       ’प्रेम पालता है देह को
      कविता चेतना को’ कविता और प्रेम के बीच जहां एक नए रिश्ते को जहां परिभाषित करता हैं और वहीं अपने समानधर्मी कवि- पिताओं की समग्र पीड़ा
         ’कभी सोचना-
         मेरे पुत्र के विषय में
         जिसे मैं
      बिना कविता के पसंद हूं’ में बेबसी के साथ अपने ही घर अपनी कविताई को कठघरे में खड़ा भी पाता हैं…
       ’कवि से हालचाल पूछने से बेहतर है
        उसकी जेब से कलम निकाल कर देखना……
        वह छूट गयी है किसी कविता के पास
      कुछ पंक्तियां लिखते हुए’ के माध्यम से एक कवि का अपनी कविता और अपनों से आत्म-संघर्ष को आसानी से महसूस किया जा सकता है। कवि की पीड़ा ही यही हैं अभी तक  उसे अभिव्यक्ति के लिए असरदार शब्द और शेष रह गए शब्दों को सुनने- समझने वाले सक्षम पाठकों की तलाश है..
’उचटी हुई नींद’ की कविताएं अपने ’समय का सत्य’ से भी नावाकिफ़ नहीं हैं। वे
       ’घुट घुट कर मरने से बेहतर है
         जिएं कुछ देर और….
        आंसुओं को पोंछ कर चुनें
      जिंदा कुछ सपने और..’का आह्वान करते हुए उस दयनीयता को भी सामने रखती है जिस में हर आदमी फ़ंसा दिखायी देता है
       ’मैं पहचानता हूं
       प्रार्थना के भीतर छिपी लाचारी..’ के साथ
      ’ठूंठ के हाथ डरते हैं
       जड़ों से
       और मेरे हाथ
      कुल्हाड़ी से..’ पंक्तियों में भावुकता भरी चोट में छिपी अपने समय की विद्रूपताओं को झेलते जाने का दर्द भी झलकता है। लेकिन यहां विशेष ध्यान देने और गौर करनेवाली बात यह है कि कवि के इरादे- संकल्प बहुत मजबूत हैं
       ’होता है तय हर फ़ासला
      मज़बूत इरादों से…’ का शंखनाद करता दिखायी देता है और इसी ज़ज़्बे की वकालत करते हुए बहुत ही सहज भाव से अपनी सीमाओं को स्वीकार भी करता है ..
     ’कुछ रह जाता है
      दृश्य से बाहर
      होते हुए भी ठीक सामने
      देख नहीं पाते हम उसे
      अक्सर देखते हैं वही
     चाहते हैं- जो देखना..’ सब कुछ विपरीत, नकारात्मक करने को आमदा वर्तमान में भी ’उचटी हुई नींद’ के कवि ह्रदय के एक कोने में एक अविरल संगीत के साथ प्रेम का स्रोता बहता-गाता है..
यहां यह देखना कवि के ह्र्दय में प्रेम की
’किसी शेर की तरह
दहाड़ता नहीं है प्रेम
वह पुकारता है
मोर की तरह..’
या
’जीवन में हमारे
आता है प्रेम बसंत की तरह’
मोर की तरह पुकारते, बसंत की तरह आते प्रेम के इस पहले पाठ में जैसे- जैसे प्रवेश करते हैं, पाठक अपने आपको प्रेम के सुकोमल अहसास के लोक में विचरण करता मह्सूसता पाता है…
        ’प्रेम के बिना
         नहीं खिलते फ़ूल
         कुछ भी नहीं खिलता
         बिना प्रेम के..’ सा कोमल अहसास लिए
        ’मीरा ने कहा था- घायल की गति
       घायल जाने के घायल जाने’ वाली पगडंडियों पर में चांद की साक्षी और  एकांत में प्रेम के स्पर्श के इंतज़ार में प्रेम की ठुडी पर तिल भर जगह की आकांक्षा पालते हुए
      ’प्रेम करने के लिए
      लगाए सात चक्कर..’ जैसी परीक्षाओं से गुजरने के लिए भी लालायित है और प्रिय से बहुत ही नई और मौलिक अठखेलियों के बिम्ब रचता है
     ’तुम सोती हो
      घोड़े बेचकर
      उन्हीं घोड़ों को लेकर मैं
निकलता हूं- ढूंढने तुम्हें…’ के आलोक में जहां मुग्ध है वहीं द्रवित और क्षुब्ध भी है कि
     ’समय से पहले का प्रेम
     और समय के बाद का प्रेम
     होता है कष्टकारक
     ठीक समय पर
    होता ही नहीं प्रेम’ प्रेम-काल के बारे में कवि की यह भी एक नई और मौलिक शोध है। और इस अहसास मात्र से ही डर जाता है,’प्रेम नहीं रहा जब मेरे भीतर/ तब मैं कैसे रहूंगा?…
वयस्कताएं स्नेह- प्रेम को किस तरह सीमाओं में बांध कर सोच को ही विकृत बना देती है, इसकी बिरला अभिव्यक्ति  गुड़िया: एक कविता की इन पंक्तियों से अभिव्यक्त होता है
      ’जिस गुड़िया से था
       प्यार बचपन में
       कितना निष्पाप था….
       अब पाप में
       दाग गिन भी नहीं पाता’ इसी प्रकार ’गुड़िया:तीन’ में
       ’अब बचपन जा चुका
       कहां छुपा सकता हूं तुम्हें- सिवाय मन के’ में एक पिता की विवशता का आख्यान है तो गुड़िया: चार में
       ’कब तक रहोगी
        किनारों से लिपटी तुम
        एक दिन तुम्हें
        छोड़ कर किनारे
         बीच भंवर
        आना ही होगा’ में जहां बेटी के प्रति एक पिता की पीड़ा दिखायी देती है। स्त्री को लेकर लिखी कविताओं में भी कवि   की स्त्री की स्थिति, यथार्थ देख चिंतित है
       ’दुखों के पहाड़ से दबी
        औरत को देखकर
        कोई नहीं कह सकता
        यह वही लड़की है…
        एक बार मर चुकी लड़की
       अब जीना चाहती है
       कि ज़िंदा रहे लड़की
      वर्ना औरत मर जाएगी..’में वह लड़की की अस्मिता- सुरक्षा के लिए सजग भाव से संकेत करता दिखता है। इसी तरह सम्बन्धों के ठण्डेपन- गरमाहट की परतों को
      ’किसी का होना
       सुख है
       किसी का नहीं होना
      सुख है’ जैसे बहुत ही महीन अद्वैत भाव के इस सुख में मिलन- विरह- मिलन जैसे भावों के झंझावतों के बीच से गुजरते हुए भी प्रेम को सर्वोपरि स्थान पर रखता है..
      ’उचटी हुई नींद के बाद
       जब लगती हैं आंख
       अटकी रहती हो तुम
       बाहर- भीतर’ नींद के उचटने- आंख लगने के इस प्रेम- खेल का आनंद सिर्फ़ वे ही ले सकते हैं जिनकी नींदे ऎसे उचटती हैं..
’उचटी हुई नींद की कविता से गुजरते हुए मुझे नीरज दइया द्वारा अपनी कविता में कहा गया ’बार- बार विवश मैं खोज- खोज कर भीतर से शब्दों को बाहर निकालता हूं एक के बाद एक .. साथ सजाता हूं और अंतत: कविता होती है।’ कथन बहुत सही और कवि का आत्मकथ्य लगता है.’उचटी हुई नींद’ सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए’ बोधि प्रकाशन- जयपुर को बधाई व डॉ.नीरज दइया को मंगलकामनाएं!
  उचटी हुई नींद (कविता संग्रह) नीरज दइया / आवरण: रामकिशन अडिग
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान) / संस्करण: दिसम्बर, 2013 / मूल्य: 60/- ई-मेल: bodhiprakashan@gmail.com / ISBN : 978-93-83878-10-9

होते हुए प्रेम में खलल के दस्तखत

– हरीश बी. शर्मा
डॉ.नीरज दइया को पढऩा इस मायनों में सुकून भरा होता है कि वे आदतन ही प्रचलित मानकों को ध्वस्त करते हुए आगे बढ़ते हैं और कुछ ऐसा निकाल कर सामने रखते हैं, जो उपेक्षित रहा, अब तक नजरअंदाज किया गया हो। वे किसी को भी सिर्फ इसलिए नहीं मानते कि उनकी अग्रज पीढिय़ों ने गुणगान किया है। किसी को मानने के लिए उनके पास अपने कुछ औजार हैं। उनका अपना लोक है। अग्रज पीढ़ी की हदों को नापने की भी एक अनोखी दृष्टि है और कुछ नया करने के लिए समुचित मेहनत करने की ललक भी। इसीलिए कहा भी जाता है कि नीरज दइया का साहित्यिक-चरित्र है ही ऐसा जो उन्हें अचानक से विवादों के बीच खड़ा कर देता है। इसे बहुत ही सकारात्मक तरीके से समझा जाए तो यह कि उनके लिखे हुए को पढऩा तयशुदा फार्मेट से उबरना है, कुछ नया पाना है।
‘उचटी हुई नींद’ की कविताएं इससे भिन्न नहीं हैं। इस काव्य संग्रह के माध्यम से वे हिंदी में कविताएं लिखते हैं तो यह उनके प्रचलित स्वरूप से भी भिन्न है। राजस्थानी में ही लिखने वाले नीरज दइया का हिंदी कवि रूप इसमें मिलता है तो दूसरी ओर इस बार यहां नीरज दइया आलोचक नहीं है, प्रेम में पगे हैं। हालांकि कहीं-कहीं वे यहां भी कविता क्या होती है के सवाल से मुठभेड़ करते हुए अपने पाठक को यह भी सिखाने की कोशिश करते हैं कि कविता अमुक जगह होती है लेकिन फिर भी यहां नीरज दइया जितने प्रेमिल हैं, पहले नहीं दिखे और इस वजह से यह संग्रह खास बन जाता है।
प्रेम को उन्होंने बहुत सारे फ्रेम दिए हैं और प्रतीकों के माध्यम से उन हादसों पर भी संकेत किया है जो माने तो प्रेम गए लेकिन वास्तव में प्रेम से मिलते-जुलते सहानुभूति, दया इत्यादि थे। यहां कवि का संकेत बहुत ही गहरा है कि प्रेम का रिप्लेसमेंट सिर्फ प्रेम ही है, इसकी आड़ में जितनी बार भी दूसरी चीजें आएंगी समय के साथ खारिज होती जाएंगी, प्रेम के खांचे में सिर्फ प्रेम ही टिक पाएगा।
और वे जब कहते हैं, ‘घटित होता है/ जब-जब प्रेम/पुराना कुछ भी नहीं होता/हर बार होता है नया/’
या के
‘प्रेम के बिना नहीं खिलते फूल/कुछ भी नहीं खिलता बिना प्रेम के।’
तब प्रेम को समझने से अधिक समझाने की कोशिश करते हैं। प्रेम पर एक नए तरीके से नजर फेंकते से नजर आते हैं। वे पूरे संग्रह में प्रेम बहुत कम करते हैं। या तो प्रेम को परिभाषित करते हैं और प्रेम और अप्रेम के बीच भेदों को उजागर करते हैं या होते हुए प्रेम के दृश्य रचते हैं। नीरज दइया का प्रेम को समझने-समझाने का यह सलीका इन्हें प्रेम कवि के रूप में स्थापित तो करता है लेकिन प्रेमी नहीं, बहुत अधिक गहरे देखें तो वे प्रेक्षक हैं। उचटी हुई नींद के शीर्षक की तरह यह कविताएं भी उनकी प्रेम और प्रेम के बीच आने वाले दखल का परिणाम है।
नींद के उचट जाने के बाद होने वाली बेचैनी की बानगी है। वापस नींद नहीं आने तक नींद उड़ाने वालों के नाम जारी किए गए उलाहने हैं। यीधे-सीधे कहूं तो ये कविताएं होते हुए प्रेम में पड़े खलल के दस्तखत हैं, एक दस्तखत देखिये, ‘कभी कुछ लिखा/ कभी कुछ/ जो भी लिखा/ समय का सत्य था/ मैं था वहां/ तुम थी वहां…’
और इसी तरह गीत-2 में वे कहते हैं।
जो बात/ आज तक कही नहीं/ किसी संकोच के रहते/ रहा होगा कोई डर/ बात वही/ कह रही हो आज तुम/ दोस्तों के बीच/ गुनगुनाते हुए गीत/ बात यही/ बहुत पहले/ सुन चुका मैं/ अब भी डरता हूं मैं/ मैंने कभी प्रेम-गीत गाया नहीं।
और प्रेम का समय शीर्षक कविता में
‘जब मैंने किया प्रेम/ वह समय नहीं था/ वह प्रेम था समय से पहले।’
ऐसी बहुत सारी कविताओं के माध्यम से प्रेम के इर्दगिर्द वे खूब सारे रंग रचते हैं और प्रेम को और अधिक खोलते जाते हैं, पारदर्शी बनाने की हद तक खोल देते हैं।
प्रचलित मान्यताओं के चौखटों को तोडऩे वाले गोताखोर नीरज दइया के लिए कविता रूपी औजार नया नहीं है लेकिन वे वस्तुत: गद्य के नजदीक रहे हैं और इस कृति के प्रेम कवि नीरज दइया का यह गद्य-प्रेम इन्हें आखिरी तक आते-आते कविता के खाते में आलेख जोडऩे का नवाचारी बना देते हैं। जो लोग नीरज दइया को जानते हैं, वे अंतिम की तीन आलेख टाइप कविता (गद्य-कविता) पूर्वज, पापड़ और विवश को पढ़ते वक्त इसे उनके किसी अगले सीक्वल की आहट बता सकते हैं। लंबी कविता के कई प्रयोग कर चुके नीरज दइया क्या अपनी उचटी हुई नींद का उपयोग इस तरह की गद्य-कविताओं के रूप में भी करेंगे?
यह सवाल उन्हीं के लिए छोड़ा जाना चाहिए। क्योंकि जब वे ‘पिता’ कविता में कोटगेट पर कविता लिखने नहीं लिखने का सवाल उठाते हैं तो कोई बड़ी बात नहीं है कि इन तीन आलेखों को शामिल ही सवाल उठाने के लिए किया हो। लेकिन इन सभी से अलग नीरज दइया की इन कविताओं से निकलते हुए उनके कभी प्रेमिल रहे होने की जो खबर हाईलाइट होती है, वह उनकी बहुत सारी प्रचलित छवियों को तोड़ती है, नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर करती है।
डा.नीरज दइया जब आलोचना करते हैं तो भले ही उनके पास इतनी मजबूत लॉबी नहीं हो जो उनके लिखे हुए को चर्चा में में लाए लेकिन इन सभी से विचलित हुए बगैर वे पूरी जिम्मेदारी से लिखते हैं, शायद यह सोचकर कि समय की सतह पर जब कभी नीर-क्षीर का युग आएगा, उनके लिखे हुए को भी समझा जाएगा। ठीक उसी तरह, उनकी प्रेम कविताओं का यह संग्रह भी समय से अपने लिए एक दृष्टि की मांग तो करता ही है। मैं कामना करता हूं कि जिस स्तर पर जाकर डॉ.दइया ने प्रेम को समझा है, उसी स्तर के पाठक भी उन्हें मिले। शुभकामनाएं।

उचटी हुई नींद (कविता संग्रह) नीरज दइया / आवरण: रामकिशन अडिग
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर (राजस्थान) / संस्करण: दिसम्बर, 2013 / मूल्य: 60/- ई-मेल: bodhiprakashan@gmail.com / ISBN : 978-93-83878-10-9


सुकून देती नीरज दइया की कविताएं

विजय शंकर आचार्य
उचटी हुई नींद के बाद/ जब लगती है आंख/ अटकी रहती हो तुम/ भीतर-बाहर/ जैसे नींद में/ जागते हुए।/ नहीं चलता मेरा कोई बस। मैं नहीं जान ही पाया- कब उचटी नींद/ कब लगी आंख!
नींद का उचटना सामान्य आदमी के लिए साधारण घटना हो सकती है। संवेदनशील मन इस नींद के उचटने को बहुत अलग ढंग से समझता है और अभिव्यक्त करता है। उचटी हुई नींद कवि, आलोचक डॉ. नीरज दइया का प्रथम हिंदी काव्य संग्रह है। इस दौर में जब कहा जा रहा है कि कविता का युग समाप्त हो चुका है नीरज की कविताएं कुछ हौसला देती नजर आती हैं। साठ कविताओं के इस संग्रह में अंतिम तीन कविताओं में प्रायोगिक रूप में तीन गद्य कविताओं को भी स्थान दिया है।
नीरज की कविताओं से गुजरते हुए लगता है उनका अपना एक संसार है जो केवल ऐसा सपना भर नहीं जो सिर्फ देख कर भूला जा सके। संग्रह ‘एक सपना’ कविता से प्रारम्भ होता जहां कवि कह देता है- किसी भी उडान के लिए/ एक आंख चाहिए/ और चाहिए, आंख में/ एक सूर्यदर्शी सपना। इस युग में जब चारों ओर सपनों के सौदागर बाजीगरी से सपनों को बेचकर मुनाफाखोर बने हुए हैं। ऐसे में जब सपनों पर पहरे बैठाएं जा रहे हों। ऐसे में जब सपने दिखाकर, सपनों को तोड़ा जा रहा हो तब डॉ. दइया के ‘कुछ सपने और’ आशा जगाते हुए आह्वान करते नजर आते हैं- घुट-घुट कर मरने से बेहतर हैं जिए कुछ देर और… / भूल जाएं सब कुछ, चले कुछ आगे और…./ किसी आकाश का बनकर बादल बरसें कुछ देर और…/ आंसुओं को पोछ कर चुनें जिंदा कुछ सपने और….
किसी भी रचना का पाठ करते हुए यदि पाठक अपनी संवेदनाओं में गमन करते हुए कवि की संवेदनाओं का हमसफर बन जाए तो रचना की सफलता ही कही जा सकती है। इस संग्रह को पढ़ते हुए यदि पाठक के साथ ऐसा होता है कोई अतिश्योक्ति नहिं है। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक उनके साथ बतियाने लगता है। वह प्रेम के लोक में विचरण करने लगता है और प्रेममय हो जाता है। खोखली होती जिन्दगी में प्रेम के मरने के इस दौर में जब पाठक अपनी खोखली हंसी के बीच डॉ. दइया की ‘खोखली हंसी’ में प्रवेश करता है उसे अपने अंतस तक पैठे खोखलेपन से दो-चार होना पड़ता है- प्रेम के बिना/ नहीं खिलते फूल/ कुछ भी नहीं खिलता/ … जो खिलता हुआ उसके पीछे प्रेम है/ जहां नहीं प्रेम/ वहां सुनता हूं- खोखली हंसी।
इस भयावह, क्रूर उठापटक वाले स्वार्थपरक युग में जब प्रेम ‘ढूंढते रह जाओगे’ की सीमा तक आ चुका है। ऐसे जलते उबलते परिवेश में कवि का प्रेम को ढूंढना और उसे बचाए रखने की जद्दोजहद में अपनी नींद को उचटा देना साधारण प्रेम के बूते की बात नहीं है। इन कविताओं को प्रेम कविता कहना शायद इसलिए उचित नहीं होगा क्योंकि बदलते युग में प्रेम के मायने बदल गए हैं। नीरज की कविताओं के प्रेम में जमाने की हवा की स्थूलता नहीं है एक गहराई जिसे जानने के लिए अनुभूति के गहनतम अंतस तक पैठना जरूरी हो जाता है।
आज के इस युग में जब मानवीयता सिर्फ समाचारों की सुर्खियां बटोरने के लिए सप्रयास की जाती है, जब हमारी स्मृतियों को खत्म करने के लिए साजिशें की जा रही हैं। ऐसे में कवि अपनी स्मृति को सहेज कर रखना चाहता है और कह देता है तुम्हारी स्मृति में हैं/ कई गीत/ उन में से चुनकर एक/ गा रही हो तुम/ कहा तुमने/ आवाज पर मत जाना/ स्मृति पर जाना/ क्या गीत के सहारे/ पहुंच सकूंगा मैं/ तुम्हारी स्मृति तक?
सामान्यतः लोग अपने संग्रह का शीर्षक संग्रह में प्रकाशित किसी एक कविता के शीर्षक को रख देते हैं। लेकिन डॉ. नीरज ने यहां एक प्रयोग किया है। उनके कविता संग्रह में ‘उचटी हुई नींद’ नाम की कविता नहीं है। लेकिन कवि का गद्य कविता का प्रयोग कम असरकारक रहा। गद्य कविताएं पहले की कविताओं की तुलना में कम प्रभाव छोड़ती हैं।
कुल मिलाकर नीरज की कविता दैहिक और आलोकिक प्रेम की उस सीमा पर खड़ी है जहां पाठक अपनी अन्तरावस्था से जहां भी पहुंचना चाहे वहां जा सकता है। इन कविताओं की खास बात इनका सीधापन है। इनमें लय है जो पाठक को कविता दर कविता आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। डॉ. नीरज की कहीं कृत्रिमता नजर नहीं आती। आज के इस कृत्रिम युग में कविताएं सुकून देती हैं।

संयुक्त निदेशक (कार्मिक)माध्यमिक शिक्षा राजस्थान, बीकानेर
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उचटी हुई नींद (कविता संग्रह) ; कवि – डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर ; संस्करण : 2013 ; पृष्ठ संख्या : 80 ; मूल्य : 60/-
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(शिविरा, नवम्बर 2015 में प्रकाशित)